बुधवार, 24 जुलाई 2013

वर्षा ऋतु



वर्षा के बुँदे
रिम झिम बरसे
सावन भादों।

मेघ में छुपे
सूरज गगन में
अँधेरी धरा।

काले बादल
बूंद बूंद बरसे
बादल रोया।

हरित घास
हरीभरी धरती
हरा है खेत।

नया कोंपल
हरा  हरा  पातल
हरा पादप।

सी -सी झिंगुर
टर-टर मेंढक
गीत मधुर ।

खुश नहीं भू
दुराचारी नर से
खपा प्रकृति।


कहीं तूफान
कही पर अकाल
इंद्र की मर्जी।


धुप गायब
पवन का प्रकोप
जीवन ठप्प।


टुटा छप्पर
बारिश निरंतर
भीगे सामान।

१०
११
भीषण बाढ़
सड़क बनी नदी
घर में पानी।

१२
बेहाल नर
अभूत बरबादी
पुकारे त्राहि।
१३
और ना बर्षो
रुक जाओ बादल
दुखी ना करो। 
**************


कालीपद "प्रसाद "
सर्वाधिकार सुरक्षित

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

क्या अर्पण करूँ !






 Religion aims at " getting salvation " and salvation  is always personal or individual, therefore religion  is strictly personal. It cannot be a matter of any community. One has to decide how to get salvation and what is the meaning of salvation. If salvation means " merging with God" or ' reaching God' then a soul can merge with God  individually.   'Getting salvation following a religion' means following   a path (Hinduism, Islamism, Buddhism,Jainism .etc.) through which one can walk up to  God. Every individual has the right to choose a path of his own choice. 
         When God is Omnipresent and Omnipotent why should one go to Mandir, Masjid, Grudwara, Church etc . in search of God ?. He is present everywhere.
          In mandir when you pray, you close your eyes and view HIM in your perception. You can do the same from the place where you are. Meditation is possible when there is peace around.Meditation is not possible in a noisy place. In ancient time, for meditation, Muni Rishis used to go to forest /lonely places  where there is no noise . 
           Every religion give stress over "Devotion" i .e 'Offering of sentiments-feelings-Bhavna'. One can get salvation if he is emotionally  devoted to God . There is no need of offering of any material things to God. Because  everything is created by him , so all belongs to him. Many religions don't allow any material offerings . But in some religion, it is allowed to safe guard the interest of so called priest. If you think deeply, you will realize that no one need to offer any material things in the name of God. Everything belongs to Him. We can only BOW before Him and Offer 'shradhaa -sentiments-feelings-Bhavna' and  patra - pushpam which convey our feeling to HIM.
             Since religion is personal , it should not be made public. All probachans on TV channels are not making the people really religious/spiritual but making the innocent people orthodox. Through pranbachan   they are extracting money from the God fearing people .It is neither good for the individual nor the society .



           मज़हब का उद्येश्य यदि 'जन्म- मृत्यु' के बंधन से मुक्ति पाना है -अर्थात "मोक्ष " है, तो यह निश्चित रूप से बिलकुल निजी और व्यक्तिगत है। "मोक्ष" तो एक व्यक्ति को उसके कर्म के आधार (ईश्वर के प्रति  भाव,भक्ति और समर्पण )से मिल सकता है। अत: मज़हबी (धार्मिक,आध्यात्मिक )कार्य केवल और केवल व्यक्तिगत कार्य है। यह  किसी भी हालत में सामाजिक या सामुदायिक नहीं हो सकता। मोक्ष का अर्थ यदि "आत्मा का परमात्मा से विलय " है  तो एक आत्मा का परमात्मा से विलय भी व्यक्तिगत है।अत: मज़हब व्यक्तिगत है।
           "मोक्ष" के लिए कौन सा 'मत' या 'पथ ' का सहारा लेना है यह भी व्यक्तिगत विश्वास या आस्था पर निर्भर है। हर व्यक्ति को अपने अपने पथ (मत- जिसे मज़हब कहते हैं जैसे हिन्दू , इस्लाम ,सिख ,इशाई ,जैन,बौद्ध  इत्यादि मत ) चुनने का हक़ है। कोई भी मत बुरा नहीं है। परन्तु एक मत पर चलने वाले कुछलोग अपने निहित स्वार्थ सिद्धि के उद्येश्य से अपने मत को श्रेष्ट बताकर दुसरे की बुराई  करते हैं। यही काम दुसरे मतवाले भी करते हैं।फलस्वरूप सभी' मत' में कुछ बुराइयाँ आ गई हैं और अच्छाईयाँ  दब गयी है।
             जब ईश्वर सर्वशक्तिमान ,सर्वव्यापी हैं ,हर जगह ,हर व्यक्ति ,हर  कण में व्याप्त हैं तो उन्हें खोजने के लिए मंदिर , मस्जिद, चर्च ,गुरूद्वारे  जाने की क्या आवश्यकता है ? वहाँ जाकर भी तो वह मिलते  नहीं। वहाँ  जाकर आप आँखें बंद कर उनका ध्यान करते हैं।अपने कल्पना (Perception)  में उनकी दर्शन करते हैं। उनसे बाते करते हैं। यह काम तो आप अपने घर में किसी शांत स्थान पर बैठकर कर सकते हैं। ईश्वर का ध्यान करना ,मनन करना यदि पूजा है तो यह काम जहाँ शांति है वहीँ हो सकता है ना कि वहाँ जहाँ सैकड़ों लोग बाते कर रहे हों या लाउड़ स्पीकर से कोई पाठ हो रहा हो।वहाँ वास्तविक पूजा तो नहीं  होती  परन्तु पूजा का आडम्बर का प्रदर्शन जरुर होता है। इसीलिए प्राचीन काल में ध्यान के लिए मुनि -ऋषि शोर शराबे से दूर जंगल/पर्वत /निर्जन स्थान में जाते  थे।
           आजकल पूजा माने मौज मस्ती। आयोजक आपका जेब ढीला करके (चंदे के रूप में )  खूब मौज करते हैं।पूजास्थल से शांति को मार मार कर भगा दिया जाता है और गलाफाडू  रैप या डिस्को बजाया  जाता है।

          प्रत्येक मज़हब (मत) "भाव,भावना ,भक्ति ,समर्पण "पर जोर देता है अर्थात ईश्वर को केवल आपकी "भक्ति " चाहिए और कुछ नहीं। "भक्ति" जो केवल आपकी निजी है ,व्यक्तिगत है।बाकी सब तो ईश्वर का है। यह तन ,मन भी उनका है। जो भी भौतिक चीजे हैं (रुपये -पैसे,धन,संपत्ति )सब उनका दिया  हुआ है। इन सबकी उन्हें कोई चाह  नहीं। उन्हें केवल आपकी श्रद्धा-भक्ति चाहिए।

            किसी किसी मज़हब  में भौतिक सामग्री का अर्पण वर्जित है। परन्तु किसी २ में पुजारियों के हित के लिए यह अर्पण स्वीकार किया जाता है।यदि आप गंभीरता से सोचे तो आपको महसूस होगा की ईश्वर को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है। सभी तो उनका है। हमें केवल उनके सामने सर झुककर अपनी "श्रद्धा-भक्ति -भाव" अर्पण करना है। उनके द्वारा बनाए पत्ते और फुल, हमारी भावना  का सौरभ को  उन तक पँहुचाने  में सक्षम हैं। 
               सार्वजानिक रूप से टी वी चेनलों में लम्बी लम्बी प्रवचन लोगो को आध्यात्मिक नहीं बना रहे हैं वरन सीधे साधे  धर्मभीरु लोगो को अन्धविश्वासी बनाकर उनसे पैसा वसूल कर रहे हैं।

कालिपद "प्रसाद "   


बुधवार, 3 जुलाई 2013

मेरी माँ ने कहा !

मेरी माँ ने कहा !

 पढाई समाप्त कर नौकरी के लिए
 घर छोड़ जब शहर के लिए था  निकलना ....
मेरी माँ ने मुझ से कहा बेटा!
एक बात मेरी तुम गाँठ बांध रखना। 
दुनियां में अच्छे लोग है कम  ,
शैतान  हैं  ज्यादा ,
अच्छों के साथ करना दोस्ती ,
शैतानों से तुम हमेशा बचके रहना।
शैतानों को पहचानना मुश्किल है
ये अच्छों का मुखौटा पहनकर घूमते हैं
जरुरत से ज्यादा मीठी मीठी बाते करते हैं ,
बातों बातों में ही मन मोह लेते हैं।
धीरे धीरे नज़दीक  आते है
मित्रता की झूठी ढ़ोंग रचाते हैं
अपनी नकली भेद बताकर तुम्हे
तुमसे  तुम्हारा असली भेद ले जाते हैं।
पहले भेद लेते हैं फिर पीछे से वार करते हैं
दोस्ती का कोई मूल्य नहीं उनके पास
जान लेने में भी नहीं हिचकते हैं।
दोष गुण  जैसा भी हो तुम्हारा
खरी खरी  बोले जो मुहं पर तुम्हारा
चाहे तुम्हे अच्छा लगे या बुरा
दोस्ती तुम उन्ही से ही करना।
दोष को छुपाकर जो झूठे तारीफ़ करे तुम्हारा
मीठी मीठी बाते कर जो मन बहलाए तुम्हारा
उनलोगों से तुम हमेशा कुछ दूर रहना
उनसे कभी दोस्ती का हाथ ना बढ़ाना।
शैतान लोगों का पहचान जानो ,यही
सावधान रहना ,इनके चंगुल में कभी फंसना नहीं।


कालीपद "प्रसाद "


©सर्वाधिकार सुरक्षित