मंगलवार, 12 मार्च 2013

अहम् का गुलाम (भाग तीन )

इस बीच  रश्मि की माँ एक बार प्रकाश से मिल आई थी। प्रकाश ने स्पष्ट शब्दों में कहा था ,"माता जी ,रश्मि बहुत अच्छी है परन्तु उसमें  सिर्फ एक दोष है।  कोई भी बात जो उसके विचारों के प्रतिकूल है, उसे वह मानने को तैयार नहीं है। वह जल्दी गुस्सा हो जाती है और अप्रासंगिक तर्क  करने लग जाती है जो एक पढ़ी लिखी लड़की से आशा नहीं की जाती है।उसको समझाने की कोशिश करो तो चिड जाती है , यही झगडे का मूल कारण है।आप जानती है ,पत्नी ही गृह  शांति   का मूल है। उसे उसकी रक्षा के लिए असीम सहनशीलता और धैर्य का परिचय देना पड़ता है।रश्मि यहीं मात खा जाती है।  

"मैं उसे समझा दूंगी " माँ ने कहा था।

"आपके पास वह पांच,छै महीने से है।आगे क्या करना चाहती है ?कुछ बताया उसने  ? प्रकाश ने पूछा 

"नौकरी करना चाहती है। परन्तु कहीं से कुछ आया नहीं अभी तक।" माँ ने बताया। 

"अच्छा है ,नौकरी करेगी तो शायद अलग अलग लोगो से मिलते जुलते रहने से उसके व्यवहार में कुछ परिवर्तन आ जाये।' प्रकाश ने आशा व्यक्त किया।फिर कुछ देरतक दोनों चुप रहे।

माता जी उठ खड़ी हुई और बोली ,"अच्छा बेटा मैं चलती हूँ ,अपना ख्याल रखना।"   प्रकाश उनको छोड़ने रास्ते तक गए। उनके पैर छुए और उनको रिक्से में बैठा दिया। "खुश रहो बेटा " माँ ने आशीर्वाद दिया और रिक्सा चल पड़ा।  

               करीब साल भरसे रश्मि नौकरी की तलाश में खून पसीना एक कर रही थी परन्तु कहीं से कोई उम्मीद की किरण नज़र नहीं आ रही थी।आज फिर एक इंटरव्यू के लिए जा रही थी तभी उसकी सहेली  नीना  बस स्टॉप पर खड़ी मिली। 

 "हेलो रश्मि , कहाँ जा रही हो ?"  नीना ने पूछा 

"बस यूँ ही जरा काम से जा रही हूँ।"

"अरे हमारे स्वीट जीजा जी को कहाँ छोड़ आई? हम नज़र थोड़े  ही लगायेंगे ? " यह नीना थी जो हर बात में मज़ा लेना बखूबी जानती थी।

" यार छोड़ना ये बातें , यह बता तू बनठन कर कहाँ जा रही है ?"

"अरे जाना कहाँ है ?तुझ जैसे खुश नसीब हम थोड़े ही हैं ? अभी तो हम  दुल्हे की खोज में मारे मारे फिर रहे हैं। सच ,इर्षा होती है तेरे भाग्य पर।"

" नीना , तू ने यह छेड़खानी की आदत अभी तक  छोड़ी नहीं ?"

"ओह हो ! और तूने अपनी तुनक मिजाजी छोड़ दी क्या  ?जरुर दी होगी , स्वीट जिजा जी  के प्यार  ने तुझे सब भुला दिया होगा, है ना ?" नीना चहकी।

बस आ गई थी ,दोनों बस में चढ़ गई ,सिट पर बैठकर रश्मि  ने फिर पूछा , "तूने बताया नहीं कहाँ जा रही है ?"

"स्कूल जा रही हूँ, एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती हूँऔर तू कहाँ जा रही है ?

"  यह नीना  थी।

"मैं एक नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जा रही हूँ।" रश्मि धीमी आवाज़ में जवाब दिया।

"अरे तुझे नौकरी करने की क्या जरुरत है , जीजाजी तो अच्छा कमा रहे है। आराम  से घर पर बैठ कर मौज कर। "   

रश्मि चुप रही तो नीना ने ही पूछ लिया  "    अरी! क्या सोच रही हो  ?घर पर खाना नहीं पच रहा है  क्या ?" 

"ऐसी बात नहीं है " रश्मि ने धीरे कहा।

"तो बता ना क्या बात है ?" नीना उत्सुक होकर पूछ बैठी।  

रश्मि ने एक दीर्घ स्वांस छोड़ा  फिर विस्तार  से अपनी कहानी आद्योपांत नीना को सुन दी।   

           बस स्टॉप आ चूका था। नीना उतरते हुए बोली ,"रश्मि! तुम गुस्से में बहुत बड़ी भूल कर रही हो ,अभी भी समय है ,जरा ठन्डे दिमाग से सोचना और भूल सुधारने की कोशिश करना , देखना कहीं बहुत देर न हो जाय , अपना ख्याल रखना ,मैं चलती हूँ।"

अगले स्टॉप पर रश्मि उतर गई। सौभाग्य से इस बार उसे सफ़लता मिल गई।उसे स्कूल में शिक्षिका की नौकरी मिल गई।सुबह दश बजे रश्मि स्कूल जाती और शाम को पांच बजे ही घर आ पाती। लड़कियों को पढाने  में उसे बहूत मेहनत करना पड़ता था ।इतने मेहनत  करने के बाद भी उसे केवल चार हज़ार रुपये मिलते थे और आठ हजार पर दस्तखत करना पड़ता था।यही बात उसे खलती थी परन्तु कुछ कह नहीं पाती। नौकरी  खो देने का डर था।  हेड मिस्ट्रेस छोटी छोटी बात पर नौकरी से निकल देने की धमकी देती रहती थी। यह तो रश्मि के लिए असहनीय था लेकिन मज़बूरी में सह लेती थी। अब उसको धीरे धीरे समझ में आने लगा कि प्रकाश के जिन बातों से वह चिड्ती थी उसमे वास्तव में चिड़ने की कोई बात ही नहीं थी।प्रकाश ने कभी भी उसे किसी बात के लिए  ऐसे मजबूर नहीं किया।उसे पैसे  का महत्त्व भी समझ में आने लगा था।  अधिक थकावट के कारण उसे रात को लेटते ही नींद आ जाती थी परन्तु एकबार नींद खुली तो फिर आने का नाम नहीं लेती।तब अनायास ही उसे प्रकश की याद आ जाती थी ।ऐसी ही एक गहरी रात  में जब उसकी नींद खुली  तो उसे याद  आया, प्रकाश चांदनी  रात में घुमना पसंद करता था। "वह पूर्णिमा की रात्रि थी।आधी रातके बाद उसने मुझे  जगाया था " -वह याद करने  लगी

 प्रकाश ने कहा ,"उठो ,चलो बाहर घूम आएँ।" 

" इतनी रात को बाहर क्या करने जाएँ ?" मैंने पूछा।

 "अरे देखो तो कितनी निर्मल चांदनी  फैली हुई है चारो ओर ,कितना सुन्दर ,कितना रोमांटिक वातावरण है !! तुम्हे अच्छा नहीं लगता ?"  

मुझे जाने की इच्छा नहीं थी परन्तु मैं उसके गयी थी  और लान में जाकर उसके गोद में सर रखकर मैं लेट गई थी । बालों को सहलाते हुए प्रकाश ने कहा था, "  रश्मि यदि रात में चांदनी नहीं होती तो रात अँधेरे में डूबी रहती और मेर जीवन में यदि 'रश्मि ' नहीं होती तो मैं  भी अँधेरे में भटकता रहता।" मुझे बहुत अच्छा लगा था यह् सुनकर ।मैं आँख मूंदकर तहे दिल से आनंद की अनुभूति को महसूस कर रही थी। तभी वह  दोनों हाथों  से मेरे चेहरे को पकड़कर मेरे ऊपर झुक गया था। मैं झटपट उठ बैठी थी और हलकी सी झिडकी भी  दी , "कोई देख लेगा तो क्या सोचेगा ?" और मैं भागते भागते कमरे में आगई थी।मेरे पीछे पीछे प्रकाश भी भाग कर कमरे में आगया था। वो चाँदनी रात मेरी जिंदगी में एक अविस्मरनीय रात थी।बातों बातों  में और सरारतों में रात बीत गई थी।  

कभी दार्शनिक ढंग से प्रकाश कहता ,"रश्मि तुमने कभी सोचा है कि  इस दुनिया में कौन ,कितने दिन किसी का साथ देता है ?"

"नहीं तो ,यह कैसा प्रश्न है ?"

प्रकाश ने आगे कहा ," देखो एक समय ऐसा आता है जब चारों तरफ रिश्तेदार ही रिश्तेदार होते है फिर भी अकेलापन महसूस होता है। तब लगता है  काश ! कोई ऐसा होता जो अनकही बातों को समझ जाते। "

"मैं तो हूँ तुम अकेले कैसे हो ? तुम तो कहते हो पति -पत्नी   मिलकर एक ईकाई बनती है। "

" इसी ईकाई में  से अर्थात पति -पत्नी में से कोई एक अगर चला जाय तो दुसरे के लिए छोड़ जाता है सिर्फ अँधेरा।"

  आज रश्मि को भी ऐसा महसूस हो रहा था की उसके आगे सिर्फ अँधेरा ही अँधेरा है। अकाट्य अँधेरा। " शायद प्रकश को भी ऐसा लग रहा होगा " उसने सोचा।

   वह किस उद्येश्य से आई थी ? क्यों आई थी  ? किसके भरोसे आई थी ? किसी भी प्रश्न  का उत्तर नहीं मिला।उसे लगा  चारो तरफ से प्रकाश  लुप्त हो चूका है, बचा है केवल अँधेरा, इस अँधेरे में वह अकेली है।सच में, प्रकाश के  बिना  जीवन में अँधेरा के सिवाय और कुछ नहीं बचा।  भाई , भाभी के लिए तो वह बिलकुल परायी हो गई है।

कई दिनों से सोच रही थी की प्रकाश को एक पत्र लिखे ,परन्तु लिखे तो क्या लिखे ?आते वक्त उसके प्रश्नों का ढंग से जवाब भी नहीं दिया था। यही सोच विचार में पड़ी थी कि माँ ने एक लिफाफा लाकर उसे दिया।अक्षर देखकर उसकी धड़कन बढ़ गई।अपने कमरे में जाकर अन्दर से दरवाज़ा बंद कर क्या।लिफाफा को जल्दी जल्दी फाड़कर उसके अन्दर से पत्र निकाल  कर पढने लगी।    

               प्रिय रश्मि,

                               आशा  है तुम अच्छी होगी। इस लम्बी अवधि में तुमने अपने आपको संभाल  लिया होगा और शांति से भविष्य के बारे में विचार किया होगा। मुझे नहीं मालुम की तुमने क्या निर्णय लिया है।मेरे  साथ रहते हुए कई अवसर पर तुम्हे बहुत कष्ट हुआ होगा परन्तु सच मानो मेरी इरादा कभी भी तुम्हे कष्ट पहुँचाने  की  नहीं थी ।इसके वावजूद भी यदि जाने अनजाने में मैं तुम्हे दुःख दिया है तो मुझे क्षमा कर देना। तुम्हारे जाने के बाद जिंदगी रुक सी गई है। खैर,तुम जहाँ रहो खुश रहो  , यही कामना है  मेरी। मेरा तबादला इंदौर हो गया है। दश जनवरी को रात्रि पौने नौ बजे बिलाशपुर -इंदौर एक्सप्रेस से मैं जा रहा हूँ ।वहाँ जाकर मैं अपना पता तुम्हे भेज दूँगा ।अपनी  निर्णय की सुचना उस पते से भेज देना।अगर तुम कहो तो मैं तुम्हे लेने आ जाऊँगा।अपना ख्याल रखना।

तुम्हारे इन्तजार में 

तुम्हारा 

प्रकाश .

           पत्र पढ़कर पिंजड़े में बंद पंछी की भांति रश्मि छटफटाने  लगी। अब क्या करे ?आज आठ तारीख है। दश को वह जा रहा है।  अभी तक तो वह द्विविधा  में थी परन्तु  प्रकाश के पत्र ने तो उसे रास्ता दिखा दिया।उसने भी जल्दी निर्णय ले लिया।एक टुकड़ा कागज़ में कुछ लिखा और लिफाफा में बंद करके रख दिया।  

                प्रकाश सुबह से ही पैकिंग में व्यास्त  था। वैसे तो उसके आफ़िस के दो सहायक पैकिंग का सभी काम कर रहे थे परन्तु उसे बार बार रश्मि  की याद आ रही थी।अगर रश्मि होती तो ख़ुशी कुछ और होती। पैकिंग समाप्त कर उसने सभी सामान दो सहयोकों के साथ स्टेशन रवाना कर दिया और खुद फ्रेश होने बाथ रूम में घुस गया ।फ्रेश होने के बाद सोफे पर बैठकर उसे लगा की कुछ छुट गया है।खाली घर जैसे उसके दिल में भी सूनापन घर कर गया। उसे ऐसे लगने लगा कि वह कुछ खोकर जा रहा है।वह आँख मूंद कर आराम करना चाहता था परन्तु आँख मूंदते ही एक चित्र उभर आया 'रश्मि ...रश्मि ..रश्मि  .......' उसने  अनुभव किया कि जब जब वह विशाल जन समूह के अन्दर से गुजरा, वहाँ  रश्मि की कमी महसूस हुई ,एक जोड़ी प्रेमाशिक्त आँखों कि कमी महसूस हुई। आज भी प्रकाश को वही अनुभूति  हो रही थी।  

             मनुष्य कभी कभी झूठे अभिमान में यह भूल जाता है कि जीवन की गाडी तभी आगे बढती है जब दोनों पहिये साथ साथ चलते हैं।यदि एक रुक जाती है तो दूसरा उसके चारो तरफ घुमने लगता है ,गाडी कभी आगे नहीं बढती।

              रश्मि और प्रकश के साथ भी यह बात शत प्रतिशत लागू थी।उनकी जीवन रूपी गाडी रुक गई थी।दोनों दिल से चाहते थे कि दोनों फिर से मिले पर अभिमान उन्हें मिलने नहीं दे रही थी। 

               आठ बीस पर गाडी आ गई। प्रकाश के आफ़िस के कुछ मित्र उन्हें छोड़ने आये थे।उनकी देखरेख में सहायकों ने सामान गाडी में चढ़ा दिया।प्रकाश भी सब सामान एक एक कर खुद देख लिया।गाड़ी छोड़ने का टाइम हो गया था। गाड़ी ने सिटी बजा दी थी।प्रकाश दोस्तों के गले मिलकर विदा होकर दरवाजे पर खड़ा हो गया। गाड़ी चलना शुरू ही हुआ था कि उसकी नजर दौड़ती हुई आती रश्मि पर पड़ी।एक हाथ में एक छोटी सी अटैची और दुसरे हाथ से साडी  सँभालती हुई आ रही थी।अचानक दोनों की आँखे मिली।जो कुछ कहना था शायद एक ही नज़र में दोनों कह डाले।रश्मि दौड़कर गाड़ी के पास आई तो प्रकाश ने हाथ बढ़कर उसे गाड़ी के अन्दर खींच लिया। उसे पकड़कर प्रथम श्रेणी के केबिन में जाकर दरवाज़ा अन्दर से बंद कर दिया।

प्रकाश ने रश्मि का हाथ अपने हाथ में लेकर  कहा ,"रश्मि मुझे पूर्ण विश्वास था कि तुम मुझे गलत नहीं समझोगी " 

"फिर तुम लेने क्यों नहीं आये ?"  रश्मि ने अभिमान में पूछा 

' शायद यही मेरी गलती थी " कहते  हुए उसने रश्मि को अपनी ओर खींच लिया तो रश्मि अनायास ही उसके सीने में अपना मुहँ छुपाकर फफक कर रो पड़ी।अभिमान के बादल आंसू बनकर बह गए। दिल का आकाश निर्मल हो चूका था।  बहुत दिनों के बाद वे एक दुसरे के  दिल के सच्चे   धड़कन महसूस कर रहे थे।

           गाड़ी तब तक गति पकड़ चुकी थी.फिर अपनी गति की यौवन में हिलती डुलती मस्ती में आगे बढती गई अपनी मंज़िल की ओर।

 

कालीपद "प्रसाद "
©सर्वाधिकार सुरक्षित

 

 

12 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…

अंत भला सो सब भला-
शुभकामनायें-

Madan Mohan Saxena ने कहा…

बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी.बेह्तरीन अभिव्यक्ति !शुभकामनायें.

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

प्रभावशाली ,
जारी रहें।

शुभकामना !!!

आर्यावर्त
आर्यावर्त में समाचार और आलेख प्रकाशन के लिए सीधे संपादक को editor.aaryaavart@gmail.com पर मेल करें।

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

Umda.

aabhar.

dr.mahendrag ने कहा…

विवाह पति पत्नी के बीच हर्दय का सम्बन्ध है,भावनाओं में आकर रोष से इसमें दरार आ सकती है,सहन शीलता का दूसरा नाम भी विवाह है,दोनों को ही कुछ न कुछ त्याग करना होता है.देर आये दुरुस्त आये.अच्छा अंत.संबंधों को सुलझाती अच्छी भावना प्रद कहानी.

उपासना सियाग ने कहा…

बहुत अच्छी और प्रेरक कहानी ........

Rajendra Kumar ने कहा…

बहुत ही प्रभावशाली प्रेरक प्रस्तुती.

ई. प्रदीप कुमार साहनी ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (13-03-13) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
सूचनार्थ |

Kuldeep Sing ने कहा…

आप की ये सुंदर रचना शुकरवार यानी 15-03-2013 की नई पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है...
आप के सुझावों का स्वागत है। आप से मेरा निवेदन है कि आप भी इस हलचल में आकर इसकी शोभा बढ़ाएं...
सूचनार्थ।

दिनेश पारीक ने कहा…


सादर जन सधारण सुचना आपके सहयोग की जरुरत
साहित्य के नाम की लड़ाई (क्या आप हमारे साथ हैं )साहित्य के नाम की लड़ाई (क्या आप हमारे साथ हैं )

Amrita Tanmay ने कहा…

आकर्षक प्रवाह..सुन्दर कहानी..

Kalipad "Prasad" ने कहा…

कुलदीप सिंह जी यह कहानी का भाग तीन है ,अगर हलचल में लगाना है तीनो भाग को मैं एक पोस्ट में पब्लिश कर देता हूँ