सोमवार, 11 अगस्त 2014

ईश्वर कौन है ?मोक्ष क्या है ?क्या पुनर्जन्म होता है ?





ईश्वर कौन हैं ? क्या हैं ?
व्यक्ति हैं ? वस्तु हैं ? या शक्ति हैं ?
आध्यात्मिक विवेचना तो बहुत पढ़ा किन्तु शब्दों के भूल भुलैया में ईश्वर को खोज नहीं पाया ,वास्तव में समझ नहीं पाया | अब वैज्ञानिकों के दृष्टि कोण से देखें तो उनको लगता है कि हिग्स पार्टिकल ही गॉड पार्टिकल(ईश्वरीय कण)है अर्थात उत्पत्ति का आधार है | यदि गॉड पार्टिकल(ईश्वरीय कण) ईश्वरीय तत्त्व का इकाई है तो इन ईश्वरीय इकाईयों का पुंज (समूह ) ईश्वर(परमात्मा )हैं और हर एक इकाई एक आत्मा है | अगर यह सच है तो ईश्वर ना तो कोई वस्तु है और ना कोई व्यक्ति | ईश्वर निश्चित रुप में शक्ति (एनेर्जी)है | शक्ति (एनेर्जी) का कभी विनाश नहीं होती,केवल उसका रूप परिवर्तन होता है | कभी विजली ,कभी ध्वनि ,कभी प्रकाश इत्यादि रूप में प्रकृति में मौजूद हैं | आध्यात्मिकता कहती है कि आत्मा नित्य है, सनातन है| आत्मा कभी मरती नहीं केवल चोला बदलकर दूसरा रूप धारण करती है | हर शक्ति ईकाई एक आत्मा है और इन ईकाइयोंके पुंज (समूह ) परमात्मा हैं| फिर परमात्मा या महाशक्ति का रूप क्या है ? शक्ति अदृश्य है ,निराकार है | अत: (शक्ति पुंज) ईश्वर भी अदृश्य और निराकार है |
     आत्मा से आत्मा मिलकर परमात्मा का रूप लेती है और शक्ति से शक्ति मिलकर शक्ति पुंज (अनन्त शक्ति ) बनता है | शक्ति पुंज से अलग हो कर शक्ति इकाई(आत्मा) कोई भी रूप धारण कर सकती है | एक छोटे से कीड़े मकोड़े से लेकर एक विशाल हाथी बन सकते हैं| देह आत्मा का बाहन है और जीवन यात्रा समाप्त करके देह छोड़कर अनन्त शक्ति (परमात्मा )में विलय हो जाते हैं | देह भी विखंडित होकर पञ्च तत्व में मिल जाते हैं ,इसीलिए ना शरीर का पुनर्जन्म होता है ना शक्ति (आत्मा ) का क्योकि शक्ति कभी नष्ट नहीं होती |श्री राम चन्द्र मिशन (चेन्नई) के अध्यक्ष श्री पार्थ सारथी राजगोपलाचारी इस सन्दर्भ में 
कहते है ;
”पुनर्जन्म ही कुछ गलत सा लगता है , पुनर्जन्म किसका ? आत्मा का ? नहीं ;क्योंकि जैसा हम देखते हैं कि आत्मा विद्यमान है और उसका अस्तित्व सदा रहता है | तो क्या शरीरका पुनर्जन्म होता है ? नहीं ;क्योंकि आत्मा के इस्तेमाल के लिए पंचतत्व से बने एक नए शरीर की रचना होती है |तो फिर वह क्या है जिसका पुनर्जन्म होता है ? मैं केवल इतना कह सकता हूँ कि पुनर्जन्म की अवधारणा ही अनावश्यक प्रतीत होती है |”
    उपरोक्त दृष्टिकोण से देखें तो किसी भी जीव या प्राणी का पुनर्जन्म नहीं होता है | केवल शक्ति का रूप परिवर्तन होता है| आज जो ध्वनि के रूप में है ,कल वह बिजली या प्रकाश के रूप में हो सकता है| यदि ईश्वर महाशक्ति(उर्जा पुंज ) है तो यह उर्जा भौतिक़ रूप में जीव भी हो सकती है और निर्जीव भी ,क्योकि निर्जीव में भी सूक्ष्मतम कण होता है जो उसकी  उत्पत्ति का कारण है |धर्म में भी पत्थरों और पहाड़ों को भगवान मान कर पूजा गया है|
    आत्मा (उर्जा की इकाई ) ईश्वरीय (उर्जापुन्ज)का सुक्ष्मतम कण है | एक इकाई (कण)से दुसरे इकाई में  कोई अंतर नहीं है | यह कण (आत्मा )महाशक्ति पुंज में स्वतंत्र विचरण करता है | यही ईश्वरीय अवस्था है ,परमानंद की  अवस्था | सभी बाधा बंधन से मुक्त है | शायद यही है मोक्ष की अवधारणा | यहाँ भौतिक स्वरूप से कोई सम्बन्ध नहीं है | स्थूल से विपरीत सूक्ष्म रूप है, न कोई भाव है न कोई भावना |भाव, भावना ,मन,चित्त,वुद्धि ,विचार ,आकार, प्रकृति तो स्थूल रूप का परिचायक है |  
           भौतिक जीव रूप में भाव ,भावना ,मन ,चित्त ,वुद्धि ,विचार से ही सुख दुःख की अनुभूति होती है |  निर्जीव भौतिक रूप इन सभी से मुक्त हैं | केवल भौतिक जीव रूप ही दुःख –दर्द ,जन्म –मृत्यु से मुक्ति चाहता है ,निर्जीव नहीं क्योंकि उनमे भाव,भावना और सुख-दुःख की अनुभूति नहीं होती| शायद यही कारण है कि उर्जा (शक्ति ) की निर्जीव इकाई ज्यादा स्थायी है जीव इकाई अस्थायी है और जल्दी जल्दी अपने कलेवर बदलती है |आत्मा (शक्ति की इकाई )की निर्जीव अवस्था में स्थिति परिवर्तन की समस्या होती है तो यह शक्ति विकराल रूप धारण कर लेती है |पत्थर से पत्थर टकराने पर अंगार निकलता है |परमाणु का विस्फोट भी उस शक्ति का स्थिति परिवर्तन का विरोध प्रदर्शन है
      जीवात्मा (ऊर्जा की इकाई)  शरीर का जीवन यात्रा करती है और फिर शरीर छोड़कर अपने सूक्ष्म रूप धारणकर परमात्मा में विलीन हो जाती है | जीवात्मा सदा है, नित्य है ,अविनाशी है | इसीलिए जीवात्मा का न जनम होता है न मरण | जन्म मरण तो शरीर का होता है परन्तु पुनर्जन्म तो किसी का भी नहीं होता है |पुनर्जन्म के लिए वही जीवात्मा और वही शरीर चाहिए |आत्मा न जनम लेती है न मरती है और न नया रूप के लिए वही शरीर रहता है |इसीलिए पुनर्जन्म का अवधारणा का कोई अर्थ नहीं रह जाता है ,वह निरर्थक हो जाता है |क्रमश:... 

कालीपद "प्रसाद"
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18 टिप्‍पणियां:

Digamber Naswa ने कहा…

गहन विषय .... क्या सच क्या झूठ ... क्या ये सब भी माया है किसी की ...

कालीपद प्रसाद ने कहा…

यही तो खोज का विषय है ! आपने धैर्य से पढ़ा ,आपका आभार

पूरण खण्डेलवाल ने कहा…

यहाँ पुनर्जन्म से तात्पर्य आत्मा का नए शरीर में आगमन से ही है !

कालीपद प्रसाद ने कहा…

यह नई परिभाषा होगी ,लेकिन प्रचलित आस्था के अनुसार उसी आत्मा (मृतात्मा )का लौटकर शरीर धारण करने को पुनर्जन्म कहते हैं.|आत्मा मरती नहीं इसीलिए' मृतात्मा 'कहना भी गलत है ! पढने और विचार विनिमय के लिए आभार !

Naveen Mani Tripathi ने कहा…

sampoorn hindu sanatan dharm ka darshn punarjanm pr aadharit hai ......is par lambi bahas ho sakti hai .......mai manta hoon punarjam ki avdharana ko .....

कालीपद प्रसाद ने कहा…

आप मानते हैं यह अच्छी बात है परन्तु खोज यह करना है कि आत्मा परमात्मा का स्वरुप क्या है ? किस प्रकार एक दुसरे में विलय होते हैं और फिर अलग होते हैं ? निष्पक्ष विश्लेषण ही शायद कुछ उत्तर से सके |विज्ञानं भी इसी रास्ते पर है ! धैर्य के साथ पढने और अपना दृष्टिकोण से अवगत करने के लिए आभार |

हिमकर श्याम ने कहा…

बहुत गहन विषय और उतना ही सार्थक चिन्तन...शास्त्रों और पुराणों में कहा गया है कि आत्मा तब तक एक शरीर से दूसरे शरीर में भटकती रहती है जब तक कि मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो जाती। ऋषियों की दृष्टि जो मोह का क्षय करे, वही मोक्ष है। लेकिन मोक्ष मिलना आसान नहीं। भगवान बुद्ध को निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त करने के लिए अपना पूरा जीवन साधना में बिताना पड़ा। महावीर को कैवल्य (मोक्ष) प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या करनी पड़ी।

कालीपद प्रसाद ने कहा…

आपके अमूल्य विचार से अवगत कराने लिए आभार ! यह एक गूढ़ तत्व है इसपर जितना ज्याद आलोचना हो उतना ज्यादा रहस्य का उद्गाटन हो सकता है !

Anita ने कहा…

बहुत गहन विषय..शास्त्रों में भी इसी विषय पर लिखा गया है

कालीपद प्रसाद ने कहा…

सच है परन्तु अभी भी रहस्य से पर्दा नहीं हटा ! आभार

आशीष भाई ने कहा…

बढ़िया लेखन व समझ , आ. धन्यवाद !
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सदा ने कहा…

बेहद गहन एवं सराहनीय प्रस्‍तुति

कालीपद "प्रसाद" ने कहा…

आपका आभार !

कालीपद "प्रसाद" ने कहा…

आपका आभार !

Ashok K ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Ashok K ने कहा…

मैं ही सत्य और असत्य भी मैं ही हूँ | मैं ही माया और माया से परे भी मैं ही हूँ | मैं ही कृष्ण हु और कबीर भी मैं ही हूँ

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Ashok K ने कहा…

पुनर्जन्म जीव का होता है आत्मा का नहीं जैसे की कोई ऑडियो कैसेट पूर्णतया इरेस न हो पाई और नए टेप में उसकी रिकार्डेड ध्वनी के कुछ अंश सुनाई दें यही पुनर्जन्म का इक उदाहरण है

Harita Bharadwaj ने कहा…

Bahut acha likha h...satyata per adharit...janm maran ki jhuti or andhvishwas ki kahaniya bahut suni..kuch es tarah k sach ki talas h