मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

नेपाल का भूकंप




प्रकृति की यह  ध्वंस लीला ,और चलेगी  कब तक ?
चली  आ रही  है यह लीला ,आदि काल से आज तक l

ध्वंस किया सृजन को ,खुद का  हो या मानव कृत
कुदरत के रूद्र कोप से,दहसत में है इंसानियत l   

क्या खुदा है नाराज़ ?या है प्रकृति की कोप-दृष्टि?
समय समय पर दिया झटका,स्थिर नहीं है सृष्टि l

चुपचाप सहती रहती ,धरती हर जुर्म हर शोषण
अपनी संतान मान कर,करती सबका पालन पोषण l

सहने की एक सीमा  है ,सीमा पार होता है विस्फोट
टिकाकर पीठ दिवाल पर ,धरती ने लिया है करवट l

शिशु हो या बालक ,किशोर हो या जवान ,थे सबके सपने
एक झटके में ध्वस्त हुए सब ,मिट गए सब के सब  सपने  l 

कुदरती आपदाओं पर डाल कर देखो एक नज़र 
बाड ,सुखा,सुनामी,भूकंप हैं सब कुदरती  कहर l

कुदरत की इशारा क्या है ?इंसान को पड़ेगा समझना 
गर नहीं समझे कुदरत को,पड़ेगा उसकी मार खाना l 

केदार नाथ का प्रलय फिर काश्मीर का जल प्रलय 
सोचो क्यों नेपाल का जलजला ?खतरे में है हिमालय l

कालीपद "प्रसाद'






3 टिप्‍पणियां:

Digamber Naswa ने कहा…

प्राकृति के क्रोध से तो यही लगता है की खतरे में है हिमालय आज ...

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सटीक और सार्थक प्रस्तुति..

रचना दीक्षित ने कहा…

बेहतरीन व सार्थक