बुधवार, 24 दिसंबर 2014

पुरुष ,नारी ,दलित और शास्त्र







कुछ ही दिन पहले मैंने ब्लॉग में एक लेख पढ़ा l एक महिला ने नारी की दयनीय दशा का जिम्मेदार हिन्दू धर्म ग्रंथों को माना है l उन्होंने कहा कि पुरुषप्रधान समाज में पुरुषों द्वारा रचित धर्मग्रंथों के आधार पर पुरुषों के सुविधानुसार नारी को कभी पूजनीय कहा है, तो कभी बुद्धिहीन,पतित ,अपावित्र , ताड्निया कहा हैl इसका श्रीगणेश मनुस्मृति से होता है, जिसमे कहा गया है कि नारी हर परिस्थिति (बचपन से बुढ़ापा तक ) में  पुरुषों पर आश्रित हैं l वह कभी भी स्वतंत्र नहीं है l रामायण, महाभारत में नारियों के साथ किये गए व्यभिचार और उत्पीडन धर्म के आढ में किया गया हैl इन्ही धर्मग्रंथों के आधार पर भगवान् के होने का दावा किया जाता है l उनकी पूजा पाठ की विधि-विधान बताई जाती है l मनुस्मृति के आधार पर बनी समाज रचना लोगो को दकियानुशी ,स्वार्थी और निर्मम बना दिया है ! समाज को जात-पात के नाम पर टुकडो टुकडो में बाँट दिया है l किसी को ऊँची और किसी को नीची जात घोषित कर दिया है ,जिसके फलस्वरूप तथाकथित ऊँचीजात के लोग तथाकथित नीची जात के साथ उठना बैठना पसंद नहीं करते l तथाकथित नीची जात के लोगो को वेद का अध्ययन और श्रवण निषिद्ध है l यही नहीं, तथाकथित उच्चवर्ग की स्त्रियाँ भी वेदपाठ से वंचित है l  इन शास्त्रों का सहारा लेकर उच्चवर्ग के पुरुष नारियों का और निम्नवर्ग के लोगों का सामाजिक ,शारीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण और दलन किया है ,इसिलिए  आज वे दलित है l नारी भी दलित है l इन सब भेदभाव और शोषण का श्रेय मनुस्मृति को जाता है l इसीलिए उच्चवर्ग आज भी मनुस्मृति का गुणगान करना नहीं भूलते जबकि भारतीय समाज के  विघटन में मनुस्मृति का योगदान उल्लेखनीय है !
        शास्त्रों में भगवान का अर्ध-नारीश्वर की कल्पना की गई है ,अर्थात आधा शरीर नर और आधा शरीर नारी है l यह कौन व्यक्ति है ? क्या किसी ने कभी उनको देखा है ? जब ईश्वर कौन है ? पता नहीं, तो अर्धनारीश्वर का पता कैसे लगेगा ?क्या इसका मतलब यह तो नहीं है कि ईश्वर केवल एक बौद्धिक कल्पना मात्र है ?
       दुनियां में दो प्रकार के लोग होते हैंl प्रथम वे है जो मानते हैं कि ईश्वर हैं l इन्हें आस्तिक कहते हैं l दूसरे वे लोग हैं जो मानते हैं कि ईश्वर नहीं है l इन्हें नास्तिक कहते हैं l जो ईश्वर को नहीं मानते हैं उनके लिए पूजा –पाठ ,उपवास का कोई समस्या ही नहीं है l वे अपने ढंग से खाते पीते हैं और अपना जीवन यापन करते हैं l न मंदिर-मस्जिद जाने का झंझट न कोई  कर्मकांड या नमाज की बंदिश l मुसीबत तो उनको झेलनी  पड़ती है जो मानते हैं कि भगवांन हैं l वही हमारे जीवन दाता ,अन्नदाता ,जीवन के हर सुख –दुःख दाता-हर्ता  हैंl  इसीलिए धर्मग्रंथों में दिए गए नियमों के अनुसार उनकी पूजा अर्चना करनी  पड़ती है l परन्तु यह निश्चित नहीं है कि इन पूजा पाठ ,हवन ,जप से इच्छित वस्तु की  प्राप्ति होगी या फिर ईश्वर का दर्शन होगा l आप पूजा करते जाइये और 'पूंजी का स्वाह', कहकर भूल जाइये l
       ईश्वर के मानने वालों में भी दो ‘मत’  के लोग हैं l साकार और निराकार l साकार का अर्थ है कि जैसे मनुष्य या फिर कोई अन्य प्राणी का एक शरीर है वैसा ही ईश्वर का भी एक शरीर है ,चाहे वह कितना शुक्ष्म या विशाल क्यों न हो , लेकिन है l उन्होंने अपनी कल्पना से ब्रह्मा ,विष्णु ,शिव,काली, दुर्गा,लक्ष्मी, सरस्वती ,इंद्र, वरुण, अग्नि आदि छत्तीस कोटि देव देवियों की सृष्टि की है l लेकिन २०-२५ नामों को छोड़ कर बाकी देव

देवियों*  के नाम भी शायद इन भक्तों को मालुम नहीं होगा l साकार में विश्वास रखने वालों का विश्वास है कि ईश्वर किसी भी रूप में हो सकते हैं जैसे मछली .सुकर ,सांप ,पक्षी या फिर कोई नदी ,पर्वत ,यहाँ तक कि एक पत्थर भी हो सकते हैं और इन सबका पूजा विधान भी शास्त्रों में मौजूद हैं l इन विविध विश्वासों में कौन सा सही और कौन सा गलत कोई नहीं बता सकताl जनमानस भ्रमित है और हर छोटी से छोटी शंका के निवारण के लिए पंडितो के पास दौड़ना पड़ता है l वो जो कहे वही बिना  तर्क के मान लेना पड़ता हैl दूसरे शब्दों में समाज धार्मिक आस्था के लिए पूरी तरह ब्राह्मणों पर आश्रित है l
       निराकार में विश्वास रखने वालों का मत है कि ईश्वर का कोई शरीर या रंग-रूप नहीं है l वह शक्ति पुंज है, शक्ति रूप में हर जगह ,हर वस्तु में विद्यमान हैl  वह अनादि ,अदृश्य ,निविकार ,निराकार है l सूक्ष्म रूप में या यूँ कहे  शक्ति रूप में (Energy ) मौजूद हैं l
या देवी सर्व भूतेषु शक्ति रुपेण संस्थिता ........ “ में विश्वास करते हैं l जीव में चेतना ,बुद्धि ,निद्रा , भूख ,तृष्णा ,स्मृति ,भ्रान्ति ,भाव, भावनाएं सब शक्ति से संचालित है l ग्रह ,नक्षत्र तारे सब शक्ति से बंधे हुए हैं और उसी से चलायमान हैं l
       भारतीय धार्मिक संस्कृति जो धर्मग्रंथों पर आधारित है, विरोधाभाष से भरा पड़ा है l एक उदहारण यहाँ प्रस्तुत है l कहते हैं- गौतम बुद्ध खुद ईश्वर को नहीं मानते थे अर्थात वे नास्तिक थे परन्तु ई,श्वर को मानने वालों ने उन्हें भगवान का अवतार माना है l यदि गौतम बुद्ध के उपदेशों पर विचार करे तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि वे निर्गुण विचार धारा के व्यक्ति थे l इसीलिए सगुण  वालों ने उन्हें नास्तिक कह दिया l
       गौतम बुद्ध के चार मुख्य उपदेश और आठ उससे जुड़े सह उपदेश हैं l
चार मुख्य उपदेश हैं :-

१.यह संसार दुःख और कष्टों से भरा है l 

२. दुःख और कष्टों का कारण इच्छा है l

३ इच्छा का त्याग ही इस संसार के दुःख कष्टों से मुक्ति दिला सकता है l

४. मुक्ति या मोक्ष के मार्ग की प्राप्ति आठ उपमार्ग के यात्रा से ही हो सकती है l
गौतम बुद्ध ने ईश्वर प्राप्ति की बात नहीं की, न ईश्वर प्राप्ति के लिए तपस्या की l संसार में फैले दुःख –कष्टों से कैसे मुक्ति मिले इस बात को जानने के लिए तपस्या की l उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ कि मनुष्य की इच्छा ही दुःख का मूल कारण है ,इसका त्याग ही उसे  संसार के सभी दुःख-कष्टों से मुक्ति दिला सकता है l बुद्ध ने आत्मा या परमात्मा के अस्तित्व के बारे में यह नहीं कहा कि परमात्मा नहीं है l उन्होंने ईश्वर को एक व्यक्ति के रूप में न मानकर एक सर्वोच्च शक्ति के रूप में माना है जो इस विश्व के संचालन में निहित हैl इस शक्ति  का ना कोई नाम है ,ना कोई रूप या रंग है l यह ईश्वर का निर्गुण, निराकार रूप है l इसीलिए उनकी नज़रों में सब कर्म-काण्ड व्यर्थ है lआजविश्व  का विज्ञानं भी यही मानता है कि इस विश्व में शक्ति का अलग अलग रूप है l उसी के कारण गृह नक्षत्र अपने अपने मार्ग पर भ्रमण कर रहे है l इसे आप गुरुत्वाकर्षण शक्ति कहे   या कुछ और ,नाम से कोई फरक नहीं पड़ता l विश्व की उत्पत्ति के बारे में अभी खोज चल रहा है ,परन्तु यह निश्चित है कि इसके पीछे कोई व्यक्ति न होकर स्वयं-उत्पन्न कोई शक्ति है l यदि किसी दिन यह साबित हुआ,उस दिन व्यक्तिवाद और पूजा पाठ समाप्त हो जाएगा l समाज में ऊंच नीच भी समाप्त हो जायगा l
                गीता में लिखा है –जब जब धर्म की ग्लानी होगी तब भगवान अवतार लेंगे और धर्म की रक्षा करेंगे l कौन से धर्म की बात लिखी है समझ में नहीं आता l प्रतिदिन औरतों से बलात्कार हो रहा है, कमजोर वर्ग पर जुर्म किया जा रहा है, मजदूरों से काम कराकर कम मजदूरी दिया जा रहा है, मंत्री और अफसर घपला कर अपनी अपनी तिजोरी भर रहे हैं, पंडित भोले भाले लोगों  को भगवान के नाम से ठग रहे हैं, धर्मगुरु चेलिओं के साथ रंगरलिया कर रहे हैं l क्या ये सब धर्म की ग्लानी नहीं है ? क्या ये सब धर्म स्वीकृत कृत्य हैं ? अगर नहीं तो भगवान को तो अभी ही आ जाना चाहिए l लेकिन कैसे आएंगे ? भगवान कोई व्यक्ति होंगे तभी तो आयेंगे, उनका न आना इस बात को साबित करता है कि भगवान कोई व्यक्ति नहीं  हैं वरन शक्ति है जो हर भौतिक वस्तु (जीव,जंतु,वनस्पति,निर्जीव )में सूक्ष्म रूप में मौजूद हैं और कार्य करने के योग्य बनाता है l इस शक्ति के बिना कोई काम नहीं होता है l अणु .परमाणु ,बायो सेल में यह शक्ति निहित है l यह अपना रूप बदलता रहता है ,कभी ध्वनि कभी प्रकाश तो कभी बिजली बन जाती है l
       मनुस्मृति आधारित समाज की स्थापित रचना.और सोचने समझने का ढंग ,हमारे जीवन दर्शन में परिवर्तन की आवश्यकता है l वे सोच ,फिलासफी सब पुराने हैं और आज अर्थ हीनं है l आज कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छानुसार कोई भी काम कर सकता है और कर रहे हैं l निम्नवर्ग का एक व्यक्ति शिक्षक और वैज्ञानिक का काम कर रहा है और एक उच्चवर्ग का व्यक्ति जूते के दूकान में जूता बेच रहा हैl ये दोनों काम इमानदारी और सम्मानजक काम है और आज का समाज इसे स्वीकार करता है l इसीलिए मनुस्मृति का महत्त्व सिमटकर केवल मुट्ठी भर लोगो में रह गया है l अधिकतर लोगो के लिए यह निरर्थक है l जनसँख्या की दृष्टि से देखा जाय तो दलितों से ज्यादा संख्या नारीयों  का है l नारी चाहे उच्चवर्ग की हो या निम्नवर्ग की ,सबके लिए उन शास्त्रों ने उन्हें “बुद्धिहीन पतित ,अपवित्र और नरक का द्वार” कहा है l इसीलिए नारी भी दलित में सम्मिलित है l ऐसे में शास्त्र भगवान के बारे में सही सोच पैदा करने के बदले समाज में भेद भाव पैदा करने का काम ज्यादा किया है l  

कालीपद "प्रसाद"
          

9 टिप्‍पणियां:

Shalini Kaushik ने कहा…

apni apni soch hai aur ardh adhyyan iska karan hai .nice post .

राजेंद्र कुमार ने कहा…

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (26.12.2014) को "जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि" (चर्चा अंक-1839)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

कालीपद "प्रसाद" ने कहा…

आपका आभार राजेंद्र कुमार जी .

Maheshwari kaneri ने कहा…

बढिया पोस्ट

Neeraj Kumar Neer ने कहा…

मान्यवर ये विचार आपके हैं या उस ब्लॉग लेखिका के ? खैर किसी भी हालत में शास्त्रों के ज्ञान का अभाव इसमे स्पष्ट परिलक्षित होता है। ईश्वर के अस्तित्व के संबंध में शास्त्रों में वृहत चर्चा है , आवश्यकता है उन्हे गहनता से पढ़ने की । जहां तक अवतार का प्रश्न है तो अवतार की परिकल्पना के सबंध में समाज में व्यापक भ्रांतियाँ है। देखिये ईश्वर अगोचर , अजन्मा , नित्य है , जो नित्य है उसकी जन्म और मृत्यु कैसी ? इन विषयों पर किसी भी निष्कर्ष पर पहुचने से पहले , अपनी ओर से जानकारी प्राप्त करने की पूरी कोशिश की जानी चाहिए। जहां तक अर्द्ध नारीश्वर का प्रश्न है, जो पूर्ण है वही पुरुष है वही नारी है या यूं कहें वह पुरुष भी है वह नारी भी है, परेशानी क्या है कि लोग चित्र के हिसाब से ईश्वर को ढूँढने लग जाते है, ईश्वर चित्रों में नहीं बसा करता ..... :) और चित्रों में ईश्वर नहीं है ऐसी बात भी नहीं :)

Neeraj Kumar Neer ने कहा…

और जहां तक मनुस्मृति की बात है , तो हमारा धर्म कभी किसी भी व्यक्ति पर कोई विचारधारा थोपता नहीं है , यह इस्लाम या ईसाइयत की तरह नहीं है , जहां जो बात है सबको मानना होगा, यहाँ, विचार और उसके अनुसार अमल की स्वतन्त्रता है ॥ यहाँ ईश्वर को मानने की या नहीं मानने की ॥ उसे पत्थरों में देखने की या निराकार समझने की पूरी स्वतंत्रता है और यह आज से नहीं है वरन सहस्राब्दियों से है। जो पूर्ण है वही शून्य है जो शून्य है वही पूर्ण है ........। मुझे नहीं लगता अधिकांश लोग जो शास्त्रों के संबंध में ऐसे निर्णय पर पहुचते , ऐसे किसी निर्णय से पहले उन्हे संपूर्णता में पढ़ते है ॥ बस कहीं अखबार में पढ़ लिया , कहीं पत्रिका में पढ़ लिया या कहीं सुन लिया और अपनी धारणा बना ली ......... सबसे बड़ी बात हमारा धर्म हमे पूरी स्वतन्त्रता देता है कि हम किसी बात को पहले उस पर विचार करें , समझे और तब फिर माने ... यह स्वतंत्रा अन्यत्र उपलब्ध नहीं है, अन्यत्र सर काट लाने का फतवा की व्यवस्था है... अपने यहाँ कभी सुना कि मेजोरिटी विचार से अलग विचार रखहने पर उनका सर काट दिया गया। यहाँ गुरुनानक के लिए भी जगह है और दयानन्द सरस्वती का भी दर्शन स्वीकार्य है .... इसलिए अपने धर्म के प्रति गौरवान्वित होइए .... यह सबसे विशिष्ट एवं व्यापक धर्म है ।

aprna tripathi ने कहा…

"जनसँख्या की दृष्टि से देखा जाय तो दलितों से ज्यादा संख्या नारीयों का है l नारी चाहे उच्चवर्ग की हो या निम्नवर्ग की ,सबके लिए उन शास्त्रों ने उन्हें “बुद्धिहीन पतित ,अपवित्र और नरक का द्वार” कहा है l इसीलिए नारी भी दलित में सम्मिलित है l "
शायद आपने जब जनसंख्या की बात कही तब आप सिर्फ भारतवर्ष की ही कल्पना कर रहे होगें, दलित हो सकता है सिर्फ भारत मे हो. मगर स्त्री पूरे विश्व मे हैं।
जहाँ तक मेरा ज्ञान है किसी भी वेद, पुरान, कुरान, बाइबिल मे नारी को नरक का द्वार नही कहा गया। और शायद कहा भी नही जा सकता। जो जन्म्दात्री है , जो जीवन देती है, जिसने धरती पर ममता, क्षमा, सहनशीलता को स्थापित किया हो वो कैसे पतिति हो सकती है।

Pratibha Verma ने कहा…

बढिया पोस्ट!!

Amrita Tanmay ने कहा…

सारगर्भित विश्लेषण के लिए आभार..