शनिवार, 20 अप्रैल 2013

कुत्ते की पूंछ

               "कुत्ते की पूंछ टेढ़ी  के टेढ़ी है। " इस कहावत  के पीछे की कहानी तो  सबको पता है। क्या यह कहावत  पूरी  तरह हमारे देश के प्रशासन, विशेष कर पुलिश प्रशासन पर लागु  होती  दिखाई नहीं दे रही  है ? किसी भी विषय पर ठाणे में रिपोर्ट लिखाने जाओ तो पुलिश रिपोट लिखने में आनाकानी करता है। कोई ना कोई बहाना बनाकर टाल  देता है। जब तक मीडिया या कोई प्रभावशाली व्यक्ति का हस्तक्षेप ना हो  रिपोर्ट नहीं लिखा जाता।    दामिनी केस के बाद जब नया कानून आया तो उम्मीद जगी --चलो अब पुलिस  वाले सुधर जायेंगे। अब जल्दी रिपोर्ट लिखेंगे। कार्यवाही जल्दी होगी। परन्तु पुलिश वाले ठहरे 'कुत्ते की पुंछ' ,सीधे कैसे हो जाते ? तभी तो ५ साल की मासूम बच्ची का  केस ना दर्ज किया, ना उसको खोजने की चेष्टा की। इसके पीछे की मानसिकता यही हो सकती है कि ऍफ़ आर आई दर्ज होगा तो काम करना पड़ेगा। इसलिए जबतक कोई व्ही ,आई , पी  का  केस न हो या फिर मीडिया का हस्तक्षेप ना हो, कोई ऍफ़ आर आई  दर्ज मत करो। पुलिश वालों एवं राज नेतायों के व्यव्हार से तो ऐसा ही लगता है।अन्यथा जो पुलिश वाले ऍफ़ आर आइ दर्ज करने में इनकार करता है उसे नौकरी से  क्यों ना हटा दिया जाता ?   क्या  पुलिश में ऊपर से नीचे तक सबकी समझदारी और सोच एक सी है ?  पुलिश को आपने व्यवहार से जनता में विश्वास पैदा करना पढ़ेगा और साबित  करना पड़ेगा कि पुलिश महकमा "कुत्ते की पूंछ "नहीं वरन यह एक संवेदनशील विभाग है जो समाज के दिल के धड़कन के साथ उसके भी दिल धड़कता है। 
       जनता के दबाव में आकर सरकार ने वलात्कार विरोधी कानून तो बना दिया पर उसका पालन कहाँ हो रहा है ? इस कानून को लागू करने वाले अधिकारी,कर्मचारी और पुलिश अगर निष्पक्ष  होकर इसको लागू नहीं  करेंगे  तो यह भी अन्य कानूनों की भांति फाइलों में दब कर रह जाएगी।  बलात्कार जैसे अभी हो रही है वैसे ही होती रहेगी ,थमेगी नहीं।  यह समाचार यदि सच है कि -"पुलिश वालों ने पैसे देकर गुडिया के माता-पिता को मुहँ  बंध रखने केलिए कहा है ,मीडिया में  ना जाने केलिए कहा है।" तो यह शर्म की बात है कि पुलिश वाले अपनी असफलता को छुपाने के लिए खुद गलत रास्ते अपना रहे है।
        हम अपने गौरवशाली इतहास का ढोल बजाते  रहते है .हमारे पूर्वज ऐसे थे  ,वैसे थे।  इस ढोल को पिटते पिटते हमने उसका चिथड़ा निकाल दिया है।अब ढोल का आर पार दिखाई देने लगा है।कहते है "बाप का बेटा ,सिपाई का घोड़ा ,बहुत नहीं तो थोड़ा थोड़ा " परन्तु  यहाँ तो उलटी गंगा बह रही है। अब हम भारत वासियों के कारण हमारे पूर्वजों को शर्मिंदा होना पड़ रहा है। यदि कहीं से वे हमें देख रहे है तो जरुर कहते होंगे "ये हमारे संतान नहीं हैं। "  इसकेलिए कौन जिम्मेदार है ? राजनेता , सरकारी कर्मचारी जिसमे पुलिश भी है  या जनता ?



कालीपद "प्रसाद"..

  

12 टिप्‍पणियां:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

जानबूझकर जो दहशत विकृति में फैला रहे सब .... उसके लिए इस कहावत का उपयोग कुत्ते को गाली देने के समान है

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
साझा करने के लिए आभार...!

Rewa tibrewal ने कहा…

bilkul sahi kaha apne.....abhar apka ye likhne kay liye

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आज न तो व्यवस्था बची है न ही कानून का खौफ है .... विकृत मानसिकता के शिकार हो रहे हैं ....

Maheshwari kaneri ने कहा…

ईश्वर ही जाने इस देश का क्या होगा..

jyoti khare ने कहा…


आज के संदर्भ की
विचारपूर्ण
सार्थक रचना
उत्कृष्ट प्रस्तुति


Aziz Jaunpuri ने कहा…

bartaman sadarbh me sarthak prastuti

सुशील ने कहा…

जिम्मेदारी हमें भी लेनी होगी !

Sadhana Vaid ने कहा…

बहुत ही दुखद एवँ भयावह स्थिति है ! समाज की इससे अधिक दुर्दशा और क्या हो सकती है ! शर्मनाक है सब कुछ !

दिगम्बर नासवा ने कहा…

शर्म आती है इस व्यस्था को देख के ...

madhu singh ने कहा…

nice creation ,things are really very sarious

Ranjana Verma ने कहा…

बिल्कुल सही कहा पता नहीं कब देश की व्यवस्था ठीक होगी ...