सोमवार, 22 अप्रैल 2013

सजा कैसा हो ?

 

 

 

                       पाँच  साल की बच्ची के साथ जो कुकर्म हुआ है उससे सारा  देश शर्मसार है। सभी में  आक्रोश है,सभी इस कुकृत्य को पाशविक कृत्य से भी  नीचे स्तर का  कार्य बता रहे हैं। चाहे नेता हो  ,अभिनेता हो ,साधारण जनता हो या तथाकथित कानून के रखवाले हों सभी के जबान पर एक ही मांग है कि इस कुकृत्य को करने वाले को फांसी की सजा होना चाहिए क्योंकि मृत्युदंड से बड़ा कोई दंड मनुष्य के हाथ में नहीं है।  मृत्युदंड चाहे फांसी लगाकर दिया जाय या गोली मार कर  या जहर का इंजेक्सन लगाकर या बिजली का झटका देकर या कोई और तरीके से ,मृत्यु  तो मृत्यु है , उसके तरीके से  अपराधी को या समाज को क्या फर्क पड़ता है ? अपराधी के मृत्यु के बाद जनता शांत हो जायगी ,सरकार आराम की नींद सो जायगी ,कानून के रक्षक अपने मूंछों पर तेल लगाते रहेंगे  और दूसरी बालात्कार का इन्तेजार करते रहेंगे। यही आजतक होता आया है यही होता रहेगा।

       दू:ख की इस घडी में यह देखकर अचरज होता है कि कानून बनाने वाले और कानून के रखवाले भी उन दरिंदों के लिए मौत की मांग कर रहे है ,जबकि कानून बनाने वाले को अच्छी तरह पता है कि उनने कानून ऐसा नहीं बनाए हैं जिसमे अपराधी को मृत्यु और केवल मृत्यु दंड मिल सके।कानून के रक्षक को भी पता है कि उनने जो रिपोर्ट सौपी है ,उसमे जो धाराएँ लगाये हैं उसमे मृत्युदंड नहीं मिल सकता , फिर भी जनता को भ्रमित करने के लिए मृत्युदंड की मांग करेंगे। यह दोगलापन नहीं तो और क्या है?

         संसद के बाहर सड़क पर जनता चिल्लाती तब हमारे जन नेतायों को भी जोश आता है। वे संसद के भीतर चिल्लाना शुरू कर देते है। कोई अपराधी को कड़ी से कड़ी सजा की मांग करते है तो कोई फांसी की।कुछ अपनी पुरानी  कुकृत्य को सोचकर उदारवादी का चोंगा पहन लेते हैं और अपने आवारा लाडलों को ध्यान में रख कर सभ्यता की दुहाई देकर सजा कम कराने की मांग करते हैं। उन्हें डर लगा रहता है कहीं कड़े कानून के पंजे में उनके लाडले ना आ जाए। वे कठोर सजा को बर्बरता, असभ्य समाज का हथियार  मानते हैं। उनसे कोई पूछे कि ढीले ढाले,दन्त बिहीन कानून बनाकर उन दरिंदो को बलात्कार करने का मौक़ा या छुट देना क्या  सभ्य समाज का  कृत्य है? जो शक्त कानून है उनका उचित पालन न कर अपराधी को छुट देना क्या सभ्य समाज का कार्य है ? सभ्य समाज वही है जिस में हर नागरिक बिना किसी भय के विचरण कर सके , जहाँ बच्चे, बूढ़े, बनिता (नारी) निर्भय होकर रह सके। जहाँ कानून का पालन करने वाले का सर ऊँचा रहे और कानुन के अपराधी का सर नीचे। इस प्रकार के समाज बनाने के लिए , अपराधी को  दंड देने के लिए एवं लोगो में कुकृत्य के प्रति घृणा  और भय उत्पन्न करने के लिए यदि बर्बर कानुन का भी सहारा लेना पड़े तो वह भी बुरा नहीं है। यहाँ तो उलटी गंगा बह रही है।  कानून तो है परन्तु कानून  के पालन करने वाले डर से त्रस्त  है और आवांरा सांड जिसको चाहे उसको सिंग मार रहे हैं और उसे रोकने वाले के जबान पर एक ही बात है "इनको बक्सा नहीं जायगा".

            कानून तो जैसे तैसे बनगया परन्तु हर मामला अदालतों का चक्कर काटते काटते दम तोड़ देता है। अदालतों के  तौर तरीके में सुधार   होना चाहिए। पुलिस को रिपोट फाइल करने का  एक समय सीमा होना चाहिए।जान बुझकर देर करने वाले कर्मचारी पर कार्यवाही होनी चाहिए। अदालती कार्य का भी समय सीमा होना  चाहिए।" जस्टिस डिलेड जस्टिस डिनैद Justice delayed , justice denied   "  अदालत को यह ध्यान रखना पड़ेगा।  वैसे दामिनी और गुडिया  के अपराधी पर मुकदमा चलाना तो कानून का और सत्य का तौहीन करना है।मुकदमा तो उन स्थिति में चलना चाहिए जहाँ संदेह हो। दामिनी  और गुडिया के मामले में तो प्रत्यक्ष  प्रमाणित है।इन्हें तो लोगो के हवाले कर देना चाहिए। बचपन में हमने कहानियों में पढ़ा है कि सुल्तानों ,नवाबों  और राजाओं के जमाने में साधारण से साधारण अपराधों की सजा सरे आम दिया जाता था। कहीं फांसी पर लटका कर और कहीं पर अपराधी को जनता के हवाले कर दिया जाता था।जनता पत्थर मार मार कर उसे मार डालते थे।यह दृश्य देखकर लोगो में भय उत्पन्न हो जाता था और गलत काम करने में डरते थे। आज की परिस्थिति में जहाँ अपराधियों में कानून का डर समाप्त हो चुका है ,यह जरुरी हो गया है की दामिनी और गुडिया के अपराधियों को सरे आम खम्भे  से बाध  दिया जाय और जनता को न्याय करने दिया जाय। अपराध करने वाले खुद अपनी आँखों से देखे की सजा क्या   होता है ?मौत क्या होती है? इस से अन्य अपराधियों में डर पैदा होगा। इस से अपराध ख़त्म तो नहीं होगा परन्तु कम जरुर हो जायगा। मुझे लोग अतार्किक और अनैतिक कह सकते  हैं परन्तु तर्क संगत विधि और नैतिकता से तो समाज की स्थिति बद से बदतर हो रहा है। इसलिए समाज  को और नीचे गिरने से बचाने के लिए यह कडवी घूंट तो पीनी ही पड़ेगी।   

 

 

कालीपद" प्रसाद "     

               

    

24 टिप्‍पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…

कालीपद जी, हमारा उद्देश्य होना चाहिए कि हम समाज से इस तरह की घटनाओं का होना बंद हो। किसी अपराधी को सजा देना उस का समाधान नहीं है। त्वरित रूप से किसी मामले में दंड मिल भी जाए तो वह केवल एक बदले की कार्यवाही हो कर रह जाता है। उस से समाज पर कोई असर नहीं पड़ता ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रहती है।
समाज में न्याय की स्थापना होने से ही यह संभव हो सकता है। न्याय की स्थापना के लिए इस देश को वर्तमान अदालतों से पाँच गुना अदालतें चाहिए। कुछ बरस पहले त्वरित न्यायालयों का एक प्रयोग हुआ था। इन न्यायालयों के पास 50 से 100 मुकदमे होते थे तथा उन्हें कहा जाता था कि औसतन दो दिनों में एक मुकदमे का निपटारा किया जाए। यानी हर माह कम से कम 10 से 15 मुकदमों का निपटारा। इन अदालतों ने इस गति को प्राप्त कर लिया और अदालतों ने माह में 20 सत्र प्रकरण तक निपटाए जिसे विश्वभर में सब से त्वरित गति कहा जा सकता है। लेकिन यह तब संभव है जब कि सत्र न्यायालयों के पास 50 से 100 मुकदमों से अधिक न हों। लेकिन इस के लिए अदालतों की संख्या में पाँच गुना वृद्धि करनी होगी। यह राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। लेकिन कोई राज्य सरकार इस काम के लिए वित्त उपलब्ध नहीं कराना चाहती। इस काम को करने से वोट प्रभावित होता नहीं नजर आता। आप तीसरा खंबा पर पुरानी पोस्टें देखें तो मैं ने तीन चार वर्ष पहले ही यह लिखा था कि सरकारें यदि न चेतीं तो विद्रोहों की स्थिति आएगी। वह अब दिखाई दे रही है। सब से अधिक दिल्ली में दिखाई दे रही है। दिल्ली तो सीधे केंद्र सरकार के अधीन है। यदि केंद्र सरकार दिल्ली में अदालतों की संख्या तुरंत बढ़ा दे तो वहाँ न्याय त्वरित होने लगेगा और अपराध करने वालों को लगने लगेगा कि दिल्ली में बचना कठिन है। तब धीरे धीरे ये अपराध घटने लगेंगे। दिल्ली में एक बार आदर्श स्थिति प्राप्त हो जाए तो फिर उस से राज्य सरकारों को भी इस दिशा में प्रेरणा मिलेगी उन्हें भी ये काम करने ही होंगे। लेकिन इस दिशा की तरफ अभी कोई सोच ही नहीं रहा है।

Chaitanyaa Sharma ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

समझ सकती हूँ आपके मन का रोष .... अब कुछ ठोस और विचारणीय कदम उठाने ही होगें

रश्मि शर्मा ने कहा…

रोष सही है और कुछ कड़े कदम..कड़े कानून बने ये नि‍हायत जरूरी है

कालीपद प्रसाद ने कहा…

आदरणीय दिनेश राय द्विवेदी जी ! मैं भी यही चाहता हूँ कि जो गलत काम (अपराधिक काम ) चाहे वह बतात्कार हो ,हत्या हो , वसूली हो ,बाहुबल या अर्थ बल से चुनाव जितना हो , सब बंद हो जाय।परन्तु वर्तमान परिस्थिति में यह रुक नहीं रहा है वरन बढ़ता ही जा रहा है। क्या कोई प्रभावी उपाय है किसी के पास ? माफ़ कीजिये मैं आपके इस मत से कि -"त्वरित रूप से किसी मामले में दंड मिल भी जाए तो वह केवल एक बदले की कार्यवाही हो कर रह जाता है।" सहमत नहीं हो पा रहा हूँ। न्यालायाय के त्वरित प्रक्रिया के द्वारा कानून सहमत दंड मिलेगे तो यह बदले की भावना कैसे होगी? इसके पहले भी ऐसा हो चूका है जैसे कि आपने कहा । जहाँ तक पांच गुना ज्यादा न्यायालय की आवश्यकता है ,इस बात पर मैं आप से सहमत हूँ। सरकार इस तरफ कोई ध्यान नहीं दे रही है।देश की स्थिति बद से बदतर होते जा रहा है।.इस अध्:पतन को रोकने के लिए क्या कोई तरिका है सरकार के पास ? सरकार पर जब तक दबाव नहीं पड़ता तबतक जनकल्याण का कोई काम नहीं होता। सरकार जानबूझ कर यथा स्थिति बनाये रखना चाहते है जिस से जनता का ध्यान उनके काले करतूत (घोटाला ) की ओर ना जाए। कृपया तीसरा खम्भा का URL भेजें।

vandana gupta ने कहा…

अब तो यही होना चाहिये मै भी यही लिखकर चुकी हूँ इस लिंक पर http://vandana-zindagi.blogspot.in/2013/04/blog-post_22.html

Ramakant Singh ने कहा…

आज इस जघन्य अपराध के रोकथाम के लिए मृत्युदंड ही कारगर है

Kailash Sharma ने कहा…

इस कुकृत्यों को रोकने के लिए कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है...

Rewa tibrewal ने कहा…

gussa ana hi chahiyee....par kahan kuch ho raha hai ....

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

आज की ब्लॉग बुलेटिन भारत की 'ह्यूमन कंप्यूटर' - शकुंतला देवी - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति..!
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शस्य श्यामला धरा बनाओ।
भूमि में पौधे उपजाओ!
अपनी प्यारी धरा बचाओ!
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पृथ्वी दिवस की बधाई हो...!

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

भय बिन प्रीत न होत गुसाईं .

कालीपद प्रसाद ने कहा…

आभार !

Aziz Jaunpuri ने कहा…

कठोर कदम की आवश्यकता है,पृथ्वी दिवस की बधाई

अरुणा ने कहा…

बहुत रोष है जनता में एक कदम जल्द ही उठाना होगा ..........

jyoti khare ने कहा…

आपका आक्रोश जायज है
इसके सार्थक निराकरण के लिये सभी को जागरूकता का
परिचय देते हुये न्याय तुल्य पहल करने की आवयश्कता है
जानदार प्रस्तुति

तुषार राज रस्तोगी ने कहा…

रोष के साथ साथ होश से भी काम लेना होगा....ऐसा ठोस कदम उठाना होगा के दरिंदों की रूह काँप उठे |

Annapurna Bajpai ने कहा…

रोष स्वाभाविक और लाजिमी है , किन्तु समाधान ढूँढना बेहद जरूरी है। आपकी टिप्पणियों मे एक सज्जन की टिप्पणी मे पढ़ा कि अपराधियों को दंड नहीं दिया जाना चाहिए या दंड समाधान नहीं है परंतु जबतक इस तरह के कुछ कठोर कदम नहीं उठाए जाएंगे तब तक अपराधियों पर लगाम नहीं लगेगी । चर्चाए होती ही रहती है और और कोई हल नहीं निकल पाता है ।

पूरण खण्डेलवाल ने कहा…

वाकई सजा ऐसी होनी चाहिए जिससे खौफ पैदा किया जा सके !!

कालीपद प्रसाद ने कहा…

अन्नपूर्ण जी गणतंत्र में कोई भी अपना मत रख सकता है परन्तु एक बात तो सब मानेंगे कि वर्तमान परिस्थिति में अपराध रुक नहीं रहा है .कारण यह कि अपराधियों में अब कानुन का डर नहीं है .इसलिए पहला कदम होना चाहिए इन अपराधियों डर पैदा करना ,जो मैंने लिखा उसी को ध्यान में रख कर लिखा है

Naveen Mani Tripathi ने कहा…

गाँधी जी ने कहा था पाप से घृणा करो पापी से नहीं .......सजा ..सजा ...सजा पूरे देश में चर्चा है । सजा कठोरतम मिलनी चाहिए यह भी आवशयक है । पर बेहतर ये भी होता की ये मानसिक विकृति के इन कारणों के खिलाफ भी आवाज उठती जिन से ये मनोवृति पनप रही है । इस तरह की मनोवृत्ति जन्म देने वाला भी समाज ही है । पर अफ़सोस ये की समाज इधर कदम ही नहीं उठाना चाहता है .......समाज गूगल पर अश्लीलता का मजा लेता है , समाज फैसन के नाम पर बच्चो को अश्लील परिधान पहनाता है , समाज बेटियों को अपने ही बॉय फ्रेंड से बात करने की इजाजत देता है । जो चाल चलन पहले माँ बाप बेटियों के दुल्हों के लिए परख करते थे अब सब कुछ अपरिपक्व मस्तिष्क के बच्चों पर छोड़ने लगे हैं । बलात्कार पर शोध होना चाहिए और दंड का भागीदार उन कारकों को भी बनाया जाना चाहिए जिस से बलात्कारी का मस्तिष्क बलात्कार करने के लिए प्रेरित हुआ ।

Vyas Nepali ने कहा…

वाह

Neeta Mehrotra ने कहा…

उचित तो यही लगता है कि कठोरतम् कानून बने और अति शीघ्र दण्ड मिले ..... परन्तु क्या कानून का भय मात्र इस अपराध को रोक पाएगा.....

prritiy----sneh ने कहा…

।कुछ अपनी पुरानी कुकृत्य को सोचकर उदारवादी का चोंगा पहन लेते हैं और अपने आवारा लाडलों को ध्यान में रख कर सभ्यता की दुहाई देकर सजा कम कराने की मांग करते हैं। उन्हें डर लगा रहता है कहीं कड़े कानून के पंजे में उनके लाडले ना आ जाए। वे कठोर सजा को बर्बरता, असभ्य समाज का हथियार मानते हैं। उनसे कोई पूछे कि ढीले ढाले,दन्त बिहीन कानून बनाकर उन दरिंदो को बलात्कार करने का मौक़ा या छुट देना क्या सभ्य समाज का कृत्य है? जो शक्त कानून है उनका उचित पालन न कर अपराधी को छुट देना क्या सभ्य समाज का कार्य है ?

aapne bilkul sahi kaha hai. asal mein dakait, loonte wale to vahan baithe hain to kanoon kaise banega....