रविवार, 5 अगस्त 2012

मंजिल


ऐ मेरे आंगन  के चाँद सितारे
नजर उठाकर देखो नीला  अम्बर  में
उमडते घुमड़ते कुछ बादल में
 छुपते छुपाते सूरज के सिवा
कुछ नजर नहीं आयगा तुम्हें
पर यह सच नहीं है , 
यह नजर का भ्रम है।

जरा सूरज को अस्ताचल में छुपने दो ,
फिर नजर घुमाओ आसमान में
देख पाओगे आकाश गंगा में
झिलमिलाते  तारों के बारातियों में ,
तब खो जाओगे तुम अचरज में।

असंख्य तारों    में  चमकते एक तारा
उत्तर दिशा को करता इशारा
नाम है उसका ध्रुव तारा
पुकार पुकार कर मानो
अपनी चमक से  , कह रहा है तुम से ,
"उठो ,जागो , भ्रमित मत हो ,
मैं भी एक नन्हा सा बच्चा था ,
माँ का दुलारा था।




पर  सब को छोड़कर, बन्धनों को  तोड़कर
दिल  में अटूट विश्वास लिए
मन में द्रीड संकल्प लिए
चल पड़ा था दुर्गम राह पर
अपने लक्ष को  पाने के लिए।
मैंने अपना  लक्ष पा लिया
करोड़ों अरबों नक्षत्रों में
अपने  स्थान बना   लिया।"

" तुम भी ठान लो , दृढ़ संकल्प कर लो
मन में विश्वास भर लो और चल पड़ो,
 अपने आप पगडण्डी बन जायगी
लक्ष तुम्हारे पास आएगा एक दिन
मंजिल  तुम्हे मिल जायगी।

टीम टिमाते तारों को देख
शायद तुम भ्रमित हो क़ि -
तारा बहूत छोटा होता है।
पर यह सच नहीं
हर तारा एक सूरज है
सूरज से कई गुना बड़ा है
पर हमारी नज़र कमजोर है ,
 अत: दूर से उनकी बड़प्पन
हमको   नज़र नहीं आता है " .


"बच्चों !
तुम अपने दिल की नज़र  कमजोर मत करो
दूर द्रष्टा बनो , उदार बनो
जाति ,धर्म की दूरी को दूर करो ,
कल्पना की उड़ान से प्रेरणा लो
सुनीता के संकल्पों को चुन लो
तुम भी विचरण करोगे चाँद सितारों में
सफ़लता तुम्हारे चरण चूमेगी
मंजिल तम्हारे पास आयगी
मंजिल तुम्हे मिल जायगी।"


रचना : कालीपद "प्रसाद "

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मंगलवार, 31 जुलाई 2012

चोरों की वस्ती

चोरों की वस्तियाँ हैं
एक चोर  राजा हैं, दूसरा चोर  मंत्री हैं !
 कोटवार चोर हो  ,चोर ही संत्री  हो जहाँ ,
जनता की संपत्ति , रास्ट्र की  संपत्ति ,   
सोचिये कितना निरापद हैं  वहाँ  ! 

सीधा साधा एक नागरिक          
आवाज उठाया " चोरी बंद करो "         
"राष्ट्र की  संपत्ति , राष्ट्र को वापस करो "                               
नागरिक सभी उसके स्वर में स्वर मिलाया
राजधानी में  धरना दिया .   
राजा घबराया , मंत्री को तलब किया
मंत्री अपने काम में माहिर था .
देस की कानून जानता था
उसने एलान किया
" इस देस  में चोरी रोकने का कोई कानून नहीं हैं
और
चोरी का मॉल वापस करने का प्रावधान नहीं  हैं! "

जनता ने मंत्री से कहा ,
"ऐसा कानून बनाओं  जिसमे
चोरों को  शक्त सज़ा हो  , और
चोरी का मॉल वापस करने का प्रावधान हो ."

मन्त्री ने कहा ,
हम शक्त कानून का मसौदा बना देंगे
सदन के पटल पर भी रख देंगे
परन्तु वह पास हो जायगा
इसका गैरान्टी नहीं दे सकेंगे .
क्योंकि
कानून बनाने वाले जानबूझ कर
अपने पैर पर कुल्हाड़ी क्यों मारेंगे !

मंत्री जी ने कानून का ऐसा ख़ाका बनाया
जो किसी के भी समझ न आया .
किसी ने मंत्री को नौशिखिया
तो किसी ने बच्चा बताया .
किसी ने कहा "मंत्री जी ने ऐसा  जलेबी बनाया
जिसका हर मोड़ हर घेरा 
चोर पकड़ने के लिए नहीं
यह है चोर  के लिये रक्षा किला ".
उद्द्येश्य जब सदस्यों को समझ आया
व्हयस व्होट से उसे पास कराया .
ऊपरी सदन जिसमे अनुभवी, वुद्धिमान लोग हैं
वही किया जो मत्री जी चाहते थे ,
मसौदा को लटका दिया .

जनता भ्रमित हो रही है
उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा है
किसे विश्वास करे और किसे न करे
लल्लू पंजू को छोड़िये
दिग्गज भी हैं कठघरे में .
जिसने पुरज़ोर  समर्थन किया था नीचले सदन में
ऊपरी सदन में वे बदल गए .
रचना : कालीपद "प्रसाद'' (c) All rights reserved.