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सोमवार, 27 जुलाई 2015

इंसान ईश्वर को क्यों पुजता है ?





भूल जाते है इन्सान कि मृत्यु अटल है
हर कोई यहाँ मृत्यु की पंक्ति में खड़ा है
क्रमागत मृत्योंमुखी है किन्तु इतना धीरे
आभास नहीं होता ,यही तो आश्चर्य है | 

हाँ ,इंसान को पता नहीं लगता कि कब वह मृत्यु के द्वार पहुँच गया |जिंदगी मौज मस्ती में बिता देता है ,दूसरों को मरते देखकर भी नहीं सोचता कि उसे भी एक दिन इस दुनिया को छोड़कर जाना है  |
महाभारत में यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा था,”दुनियाँ में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ?”
युधिष्ठिर का जवाब भी यही था ,”लोग दुसरे को मरते हुए देखते है परन्तु यह नहीं सोचते कि उसे भी एक दिन मरना होगा और बेफिक्र होकर अपने जीवन में मस्त रहते हैं| यही सबसे बड़ा आश्चर्य है |“
यक्ष तो संतुष्ट हो गया था इस जवाब से ,किन्तु इंसान के मन में झांककर अगर देखें तो शायद यह उत्तर सही नहीं था | इंसान कभी भी मृत्यु के प्रति बेफिक्र नहीं रहा है | वह बेफिक्र होने का दिखावा करता है |भय को छुपाने की कोशिश करता है | उसे हर घडी मृत्यु का भय सताता है |  मृत्यु की भय से उसे कभी भी मुक्ति नहीं मिली | कभी यह दबा रहता है कभी उभर कर ऊपर आ जाता है तब उसके मन,प्राण ,शरीर में कम्पन उत्पन्न करता है | वह उस भय से बचने के लिए किसी की तलास करता है जो उसे मृत्यु के भय से बचा सके | वह किसकी तलास करता है ? कौन उसको मृत्यु के हाथ से बचा सकता है ? उसे नहीं पता | उस अनजान व्यक्ति को इंसान ने ईश्वर ,अल्लाह, गॉड के नाम से पुकारा | अगर मृत्यु नहीं होती तो इंसान ईश्वर ,अल्लाह, गॉड को याद नहीं करते,न उसको पूजते और न मंदिर,मस्जिद ,चर्च,गुरुद्वारा बनाते | यह मृत्यु का डर ही है जिसके कारण ईश्वर का अस्तित्व है | ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए मंदिर,मस्जिद,चर्च,गुरुद्वारा बनाये गये | वो इनसान जिसे मौत से डर नही लगता ,वह न मंदिर जायगा न भगवान को पुजेगा | जब तक मृत्यु का भय है तब तक ईश्वर की पूजा होती रहेगी और मंदिर मस्जिदे बनते रहेंगे | अत: यह भय ही है जो इंसान जो भगवान के शरण में जाने के लिए मजबूर कर देते हैं |
         मौत तो प्रत्यक्ष है ,परन्तु मौत से बचाने वाले भगवान अप्रत्यक्ष है , यह एक रहस्य है |इस रहस्य से जिस दिन पर्दा हट जायगा उस दिन मंदिर,मस्जिद जैसे देवस्थान का महत्व भी घट जायगा |  ईश्वर जब सामने होंगे तो मंदिर की जरुरत क्या रहेगी ? पण्डे ,पुजारी ,ज्योतिषों,मठाधीशों के धंधे बंद हो जायेंगे |
         मनुष्य में सोच है ,यही भय उत्पन्न करता है |पशु पक्षी में मनुष्य जैसा सोच नहीं है | इसीलिए वे हमेशा भयभीत नहीं रहते हैं | आपातकालीन खतरे का भय है ,प्राण बचाने के लिए छटपटाते है किन्तु यह क्षणिक है | मनुष्य सदा भयभीत रहते हैं | प्रश्न उठता है ,- आखिर यह भय क्यों है ? गीता में कहा गया है ,” जैसे मनुष्य पुराना वस्त्र त्याग कर नया वस्त्र धारण करता है वैसे ही आत्मा पुराना शरीर त्यागकर नया शरीर धारण करती है |”
इंसान इस बात को सुन लेता है, पढ़ लेता है, परतु उस पर पूरा आश्वस्त नहीं हो पाता है|  पुराना वस्त्र  त्याग कर नया वस्त्र धारण करने में उसे डर नहीं लगता क्योंकि नया वस्त्र के बारे में वह सब कुछ जानता है ,वह निश्चिन्त रहता है | किन्तु पुराना शरीर छोड़ने के बाद उसे नया शरीर मिलेगा या नहीं, इसके बारे में उसे कोई निश्चित जानकारी नहीं है | इस शरीर को छोड़ने के बाद वह कहाँ रहेगा ? कौनसा शरीर मिलेगा ? मिलेगा या नही मिलेगा ?  कुछ भी पता नहीं | ये सब अज्ञानता के अन्धकार में छुपा है और इस अन्धकार में उसे धकेल देती है मौत | इस अनिश्चितता  के कारण मृत्यु से इंसान को डर लगता है | यदि उसे मृत्यु के
पहले और बाद में होनेवाली हर घटना की जानकारी मिल जाय तो शायद वह ईश्वर को याद करना भी भूल जाय | हो सकता है उस समय भगवान् की अवधारणा बदल जाय |  हर हाल में मृत्यु का भय ही मनुष्य को भगवान के शरण में ले आता है |

कालीपद ‘प्रसाद’                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                  

बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

मैं भी ब्रह्माण्ड का महत्वपूर्ण हिस्सा हूँ !

                  पृथ्वी नौ ग्रहों में से एक है ,अर्थात पृथ्वी के अलावा आठ और ग्रह  हैं l हर ग्रह के कुछ उपग्रह हैं जैसे पृथ्वी का उपग्रह चन्द्रमा है l ये नौ ग्रह और उनके उपग्रहों के साथ सूर्य को मिलकर सौर्य मंडल बनता है l कहते हैं हर तारा एक सूर्य है और अन्तरिक्ष में अनंत तारे हैं l अत : अन्तरिक्ष में हमारे सौर्य  मंडल जैसे अनंत सौर्य मंडल  होंगे l इन सब सौर्य मंडलों को मिलाकर ब्रह्माण्ड बनता है lप्रश्न उठता है -कौन है इनता बड़ा ब्रह्माण्ड का निर्माता ? कौन  इस विश्व ब्रह्माण्ड को व्यावस्थित रूप से चला रहा है ? किसने किया है मनुष्य आदि प्राणियों की सृष्टि ? किसने किया है वनस्पतिओं की रचना ? इन असंख्य सौर्य मंडलों में किस सौर्य मंडल में वह रहता है ?क्या सभी सौर्य मंडलों में वह एक ही समय में उपस्थित रह सकता है ?सामान्य वुद्धि यही कहती है कि व्यक्ति के रूप में यह संभव नहीं है , हाँ शक्ति (उर्जा ) के रूप में रह सकता है l तो क्या ईश्वर निराकार अदृश्य शक्ति है ?
            आज तक कोई इसका पता नहीं लगा पाया कि ईश्वर का वास्तविक स्वरुप क्या है परन्तु हर धर्म के लोग यह मानते हैं कि कोई है जो इस विश्व ब्रह्माण्ड को नियंत्रित कर रहा है ! वह व्यक्ति है या शक्ति है -कुछ भी पता नहीं फिर भी मानते हैं "कोई है "l  कोई इन्हें भगवान कहते है ,कोई अल्लाह ,कोई गॉड ,आदि आदि ........l हरेक धर्म ईश्वर की अलग अलग स्वरुप की कल्पना की है l सबके अलग अलग विचार है l केवल एक ही विचार सब में सामान्य है वह है "कोई अदृश्य शक्ति या स्वरुप है जो इस विश्व ब्रह्माण्ड को नियंत्रित कर रखा है l"
             मुस्लिम धर्म में हज़रत मुहम्मद को  पैगम्बर और ईशाई धर्म में युशु मशीह को ईश्वर का दूत कहा गया है l यहाँ ईश्वर निर्विकार ,निराकार ,अदृश्य हैं किन्तु हिन्दू धर्म में ईश्वर को सगुण और निर्गुण दोनों माना है l कुछ लोग सगुण ईश्वर में विश्वास रखते हैं तो कुछ निर्गुण ईश्वर में l सगुण में विश्वास रखने वालों ने  राम ,कृष्ण को साक्षात विष्णु भगवान का अवतार माना है l यही नहीं, उनके अनुसार हिंदुयों के ३३ कोटि देव देवियाँ हैं जो समय समय पर धरती पर भिन्न भिन्न रूपों में अवतरित होते रहते हैं l निर्गुण में विश्वास रखने वालों के लिए ईश्वर एक हैं और निर्विकार, निराकार ,अदृश्य हैं l यही है अद्वैत वाद अर्थात ईश्वर एक ही है अनेक नहीं l कबीर दास अद्वैत बाद के प्रमुख उपासक थे l द्वैत बाद के हिन्दू द्विविधा में हैं ,किसकी पूजा करें और किसकी न करें l अनेक मतों में बंटे हुए हिन्दू जन भटके हुए पथिक जैसे हैं ,जो चौराहे पर तो खड़ा है परन्तु नहीं जानता कौनसा रास्ता उसे उसकी मंजिल तक ले जायेगा l ऊपर से पण्डे पुजारी उनको कर्म काण्ड के जाल में फंसाकर उलझन में दाल देते है lधर्म गुरु यहाँ अनेक है और सबका अलग अलग मत है l एक दुसरे को गलत साबित करने में तुले हुए हैं और अपने को सर्वश्रेष्ट कहलाने के लिए लालायित हैं l ऐसी स्थिति में बेचारी जनता करे तो क्या करे ? थक हारकर अपनी भलाई के लिए सब देवताओं कीं  पूजा करते हैं l लक्ष्मी ,काली ,दुर्गा ,सरस्वती ,शिव ,विष्णु, राम ,कृष्ण ,हनुमान ,साईं बाबा  आदि आदि ....l शायद इनमें  से कोई खुश हो जाय और उन्हें मोक्ष मिल जाय lअनेक देव देविओं की पूजा के चक्कर में किसी एक की भी पूजा पूर्ण भक्ति भाव से नहीं कर पाते l आस्था का झुला इधर से उधर झूलता रहता है l किसी एक पर स्थिर नहीं रहती l किन्तु आध्यात्मिक उत्कर्ष का माध्यम आस्था  ही है और वही स्थिर नहीं है तो आध्यात्मिक उत्कर्ष कैसे होगा ?ईश्वर कैसे मिलेगा ?  जैसे मकड़ी अनेक धागों से बनायीं अपने जाल में फंस जाती है ,मनुष्य भी अपनी अनेक आस्थाओं के जाल में फंस कर रह जाते हैं l अपनी लार से बनाई धागे के सहारे मकड़ी छत से झूल जाता है और फिर उसी धागे के सहारे ऊपर छत पर पहुँच जाता है l मनुष्य की आस्था यदि किसी एक पर अटूट हो तो वह उसी के सहारे ईश्वर तक पहंच सकता है l चाहे वह साईं हों या हनुमान हों ,राम हों या कृष्ण हों या फिर कोई और l ये सब तो आलंबन है इनके सहारे ईश्वर तक पहुंचना है l आस्था यदि कभी साईं ,कभी राम ,कभी कृष्ण ,कभी किसी और पर बारी बारी भटकती रही तो आस्थाओं का जाल बन जायगा ,मनुष्य उसी में उलझकर रह जायगा l इसीलिए मनुष्य को चाहिए कि किसी एक पर पूर्ण आस्था रखे और उसी की पूजा पूरी आस्था के साथ करे l सभी रूप ईश्वर के हैं इसीलिए सब में श्रद्धा रखे पर पूजा एक ही रूप का करे lनिश्चित रूप में आध्यात्मिक उन्नति होगी l रत्नाकर दस्यु ने मरा-मरा जप कर अपने पापों का प्रायश्चित कर आदि कवि महामुनि वाल्मीकि बने l मरा-मरा अर्थात 'राम' उसका आलंबन था l हर इन्सान को भी परमेश्वर की प्राप्ति के लिए किसी एक को आलंबन बनाना पड़ता है l एक पर ही आस्था (भक्ति )दृढ और अटूट होती है l जहाँ आलंबन अनेक हों वहाँ आस्था (भक्ति ) कमजोर पड़  जाती है l अटूट आस्था (मानसिक रूप में सशक्त ) वालों को आलंबन की जरुरत नहीं होती परन्तु अनेक आस्था रखनेवालों को आलंबन की आवश्यकता होती है l मूर्ती पूजा का आधार यही है l  ईश्वर निर्विकार ,निराकार है ,परन्तु सब लोग इस बात पर अपनी आस्था स्थित नहीं कर सकते इसीलिए ईश्वर का साकार रूप की कल्पना की गई है l जो निराकार में अपनी आस्था केन्द्रित नहीं कर सकते ,उनके लिए साकार मूर्ती सहायक है l ब्रह्मा ,विष्णु ,महेश की कल्पना ..आदि कल्पना है l बाद में राम, कृष्ण को  विष्णु काअवतार मानकर उनकी पूजा की गई है l लेकिन ये सब तो आलंबन है l मंजिल तो ईश्वर हैं l ईश्वर अनन्त हैं ,अदृश्य है ,सर्वव्यापी है l सबको सोचना चाहिए --इस ब्रह्माण्ड को ईश्वर ने रचा है l मैं इस ब्रह्माण्ड का हिस्सा हूँ l मुझे गर्व है कि मैं एक ईश्वरीय अभिव्यक्ति हूँ l मुझे ईश्वरीय हर अभिव्यक्ति से प्यार है l हर प्राणी ईश्वरीय अभिव्यक्ति है ,प्रकृति में हर वस्तु ईश्वरीय अभिव्यक्ति है l हर अभिव्यक्ति का एक उद्देश्य है l हम उनसब उद्येश्यों को समझ नहीं पाते l हमें सतत प्रयत्न करना चाहिए उन उद्येशों को जानने के लिए l उसके लिए हमें केवल एक आलंबन का चयन करना पड़ेगा l रचना के सहारे रचनाकार तक पंहुचना पड़ेगा l

कालीपद "प्रसाद"
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सोमवार, 18 अगस्त 2014

ईश्वर कौन हैं ? मोक्ष क्या है ? क्या पुनर्जन्म होता है ? (भाग २ )


 प्रिय मित्रों ,
पिछले एक सप्ताह के प्रवास के समय ब्लॉग के माध्यम से आप से संपर्क नहीं हो पाया | प्रवास में जाने के पहले "धर्म और आध्यात्मिकता " के ऊपर एक लेख लिखा था जिसका शीर्षक दिया था ,"ईश्वर कौन हैं ? मोक्ष क्या है ? क्या पुनर्जन्म होता है ?"  वैसे तो यह विषय सनातन है, शाश्वत है ,इस पर मनुष्य जब से होश संभाला है ,तबसे आलोचना  ,विचार विमर्श करते आये हैं |जितने लोग हैं उतने ही मत है |मुनि ऋषियों ने अपने विशुद्ध ज्ञान को शास्त्रों और पुराणों के  रूप में प्रस्तुत किया !लेकिन कोई एक भी मत ऐसा नहीं है जो सर्व मान्य  हो और ईश्वर का साक्षातकार कराने में समर्थ हो |यही कारण है कि आज भी ईश्वर की खोज जारी  है |" ईश्वर को खोजना या पाना ही आध्यात्मिकता है "| इसी विश्वास के साथ "धर्म और आध्यात्मिकता " का दूसरा भाग  प्रस्तुत कर रहा हूँ |



                                                                           
बाल कृष्ण सबका कल्याण करें !
         

          ईश्वर कौन हैं ? मोक्ष क्या है ? क्या पुनर्जन्म होता है ? (भाग २ ) 


             सभी जीवों में शायद मनुष्य ही ऐसा जीव है जिसमें भाव ,भावना ,वुद्धि ,काम ,क्रोध ,लोभ , मोह, घृणा , ईर्षा ,प्यार इत्यादि स्वाभाविक प्रवृत्तियां ज्यादा पाई जाती है | अन्य जीवों में भी ऐसे अनेक सहज प्रव्र्तियाँ पाई जाती हैं परन्तु मनुष्य विशेष है एक प्रवृत्ति के लिए ,वह है "मोक्ष " पाने की प्रवृत्ति अर्थात जन्म-मृत्यु के कष्ट से मुक्ति | ऐसा माना जाता है  कि आत्मा (उर्जा की इकाई ) जब (महा शक्ति पुंज ) परमात्मा में मिल (विलय ) जाती है तो उसे जन्म-मृत्यु के दुःख कष्ट से मुक्ति मिल जाती है "|यही है 'मोक्ष' की  अवधारणा |
                 अब "मोक्ष" कैसे मिले  ? न ईश्वर /अल्लाह को किसी ने देखा है ,न उनकी आकृत -प्रकृति को कोई जानता है और न उनकी निवास स्थान का पता है | इस अवस्था में समाज के हर व्यक्ति अपनी वुद्धि के अनुरूप ईश्वर की कल्पना की और उनके खोज में लग गए |  कुछ विशिष्ट लोगो ने मिलकर ईश्वर की खोज के लिए कुछ अनिवार्य कार्य और नियमों का निर्धारण कर दिया | इन कायों को करना और नियमों  का पालन करना "धर्म" माना गया |  अर्थात धर्म का पालन करके ही ईश्वर तक पहुंचा जा सकता है |परन्तु विडंबना यह है कि कोई भी इस रास्ते पर चलकर ईश्वर तक पहुँच नहीं पाया | धर्म-कर्म सांसारिक है और आध्यात्मिकता पारलौकिक है |  जहाँ धर्म-कर्म समाप्त होता है वहीँ से आध्यात्मिकता शुरू होती है ! 
                 मनुष्य के क्रमिक विकास के साथ साथ मनुष्य अनेक समूह में बंट गए और हर समूह ने धर्म-कर्मों का अलग अलग सूचि बना लिए |उन कर्मों का करना ही उस "धर्म " का पालन करना माना जाता है ,जैसे हिन्दू धर्म में पूजा पाठ,हवन करना , मुश्लिम में रोजा रख्नना ,नमाज पढना ,इत्यादि |इसी प्रकार हर धर्म का अलग अलग नियम है | परन्तु प्रश्न यह उठता है कि क्या इन धर्म -कर्मों (कर्मकांड ) से आज तक किसी धर्म में कोई व्यक्ति ईश्वर की खोज कर पाया है ? उत्तर है "नहीं '| इसका सीधा अर्थ है कि न ईश्वर इन धर्म -कर्म (कर्मकांड )से मिलता है और न कोई धर्म पुस्तक पढने से मिलता है ,अगर मिलना होता तो आदिकाल से या जब से इन धर्मों की उत्पत्ति हुई है ,तब से आज तक किसी न किसी को मिलगया होता |चूँकि किसी धर्म के माध्यम से अभीतक ईश्वर नहीं मिला इसीलिए कोई भी यह दावा नहीं कर सकता है कि उसका धर्म दुसरे धर्म से अच्छा है | इसके विपरीत सभी धर्म का इष्ट एक है | हम भूल जाते हैं कि हम धर्म  का पालन ईश्वर (परमात्मा ) की प्राप्ति के लिए करते है | इसिलिये  इसमें कोई बुरा काम नहीं होना चाहिए | इसके वावजूद हर धर्म में कुछ अच्छाईयाँ हैं तो कुछ बुराइयाँ भी | धर्म -कर्म एक राह  है |हम सब अलग अलग राह के राही हैं लेकिन मंजिल एक हैं | हमारी राह में अभी ईश्वर मिले नहीं है , इसीलिए हमारा कोई हक़ नहीं बनता है कि हम दूसरों को कहे कि तुम अपना राह छोड़कर मेरे राह में आ जाओ | यह अनुचित कार्य किसी को करना नहीं चाहिए | वास्तव में ईश्वर कोई विशेष धर्म (कर्मकांड ) में बंधे नहीं है | सत्य तो यह है कि सभी धर्मों का मूल सिद्धांत एक ही है ,वह है ,"ईश्वर मानव के ह्रदय में निवास करते हैं "| अत: इंसान को अंतर्मुखी होकर उस "अहम् ब्रह्मा अस्मि'का खोज करना  चाहिए |
बाहर वह कहीं नहीं मिलेगा |अपने में ईश्वर को खोजना ही आध्यात्मिकता का पहला सोपान | सिद्ध मुनि ऋषि एवं महामानव गौतम बुद्ध ने यही किया | उन्हें शायद निराकार ब्रह्म (महाशक्ति पुंज या प्रकाश पुंज ) का दर्शन हुआ होगा , जिसमे केवल भौतिक वस्तु की दशा की स्थिति परिवर्तन दिखाई दी होगी ,निराकार का कोई परिवर्तन नहीं हुआ होगा | उस परम सत्ता से एकात्मभाव स्थापित किया होगा और परमानन्द का अनुभव किया होगा |इसीलिए इन कर्मकांडों का पालन करना ईश्वर प्राप्ति के लिए आवश्यक नहीं लगता यदि हम अपने अन्दर के परमशक्ति पर ध्यान केन्द्रित करने  में सक्षम है | इस परमशक्ति का कोई नाम नहीं है |यह तो हम अपने सुविधा के लिए उन्हें ईश्वर,अल्लाह ,गॉड आदि अलग अलग नाम से पुकारते है | इस परमाशक्ति को खोजना ही आध्यात्मिकता है |अत; धर्म -कर्म (कर्मकाण्ड ) से ज्यादा महत्वपूर्ण आध्यात्मिकता है |
               आध्यात्मिकता अपने में निहित उस शक्तिकण (आत्मा )के अस्तित्व से परिचय कराता है और अंतत:उस परमशक्ति की ओर ले जाती है |
                                           जय श्री कृष्ण !
कालीपद "प्रसाद " 
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सोमवार, 11 अगस्त 2014

ईश्वर कौन है ?मोक्ष क्या है ?क्या पुनर्जन्म होता है ?





ईश्वर कौन हैं ? क्या हैं ?
व्यक्ति हैं ? वस्तु हैं ? या शक्ति हैं ?
आध्यात्मिक विवेचना तो बहुत पढ़ा किन्तु शब्दों के भूल भुलैया में ईश्वर को खोज नहीं पाया ,वास्तव में समझ नहीं पाया | अब वैज्ञानिकों के दृष्टि कोण से देखें तो उनको लगता है कि हिग्स पार्टिकल ही गॉड पार्टिकल(ईश्वरीय कण)है अर्थात उत्पत्ति का आधार है | यदि गॉड पार्टिकल(ईश्वरीय कण) ईश्वरीय तत्त्व का इकाई है तो इन ईश्वरीय इकाईयों का पुंज (समूह ) ईश्वर(परमात्मा )हैं और हर एक इकाई एक आत्मा है | अगर यह सच है तो ईश्वर ना तो कोई वस्तु है और ना कोई व्यक्ति | ईश्वर निश्चित रुप में शक्ति (एनेर्जी)है | शक्ति (एनेर्जी) का कभी विनाश नहीं होती,केवल उसका रूप परिवर्तन होता है | कभी विजली ,कभी ध्वनि ,कभी प्रकाश इत्यादि रूप में प्रकृति में मौजूद हैं | आध्यात्मिकता कहती है कि आत्मा नित्य है, सनातन है| आत्मा कभी मरती नहीं केवल चोला बदलकर दूसरा रूप धारण करती है | हर शक्ति ईकाई एक आत्मा है और इन ईकाइयोंके पुंज (समूह ) परमात्मा हैं| फिर परमात्मा या महाशक्ति का रूप क्या है ? शक्ति अदृश्य है ,निराकार है | अत: (शक्ति पुंज) ईश्वर भी अदृश्य और निराकार है |
     आत्मा से आत्मा मिलकर परमात्मा का रूप लेती है और शक्ति से शक्ति मिलकर शक्ति पुंज (अनन्त शक्ति ) बनता है | शक्ति पुंज से अलग हो कर शक्ति इकाई(आत्मा) कोई भी रूप धारण कर सकती है | एक छोटे से कीड़े मकोड़े से लेकर एक विशाल हाथी बन सकते हैं| देह आत्मा का बाहन है और जीवन यात्रा समाप्त करके देह छोड़कर अनन्त शक्ति (परमात्मा )में विलय हो जाते हैं | देह भी विखंडित होकर पञ्च तत्व में मिल जाते हैं ,इसीलिए ना शरीर का पुनर्जन्म होता है ना शक्ति (आत्मा ) का क्योकि शक्ति कभी नष्ट नहीं होती |श्री राम चन्द्र मिशन (चेन्नई) के अध्यक्ष श्री पार्थ सारथी राजगोपलाचारी इस सन्दर्भ में 
कहते है ;
”पुनर्जन्म ही कुछ गलत सा लगता है , पुनर्जन्म किसका ? आत्मा का ? नहीं ;क्योंकि जैसा हम देखते हैं कि आत्मा विद्यमान है और उसका अस्तित्व सदा रहता है | तो क्या शरीरका पुनर्जन्म होता है ? नहीं ;क्योंकि आत्मा के इस्तेमाल के लिए पंचतत्व से बने एक नए शरीर की रचना होती है |तो फिर वह क्या है जिसका पुनर्जन्म होता है ? मैं केवल इतना कह सकता हूँ कि पुनर्जन्म की अवधारणा ही अनावश्यक प्रतीत होती है |”
    उपरोक्त दृष्टिकोण से देखें तो किसी भी जीव या प्राणी का पुनर्जन्म नहीं होता है | केवल शक्ति का रूप परिवर्तन होता है| आज जो ध्वनि के रूप में है ,कल वह बिजली या प्रकाश के रूप में हो सकता है| यदि ईश्वर महाशक्ति(उर्जा पुंज ) है तो यह उर्जा भौतिक़ रूप में जीव भी हो सकती है और निर्जीव भी ,क्योकि निर्जीव में भी सूक्ष्मतम कण होता है जो उसकी  उत्पत्ति का कारण है |धर्म में भी पत्थरों और पहाड़ों को भगवान मान कर पूजा गया है|
    आत्मा (उर्जा की इकाई ) ईश्वरीय (उर्जापुन्ज)का सुक्ष्मतम कण है | एक इकाई (कण)से दुसरे इकाई में  कोई अंतर नहीं है | यह कण (आत्मा )महाशक्ति पुंज में स्वतंत्र विचरण करता है | यही ईश्वरीय अवस्था है ,परमानंद की  अवस्था | सभी बाधा बंधन से मुक्त है | शायद यही है मोक्ष की अवधारणा | यहाँ भौतिक स्वरूप से कोई सम्बन्ध नहीं है | स्थूल से विपरीत सूक्ष्म रूप है, न कोई भाव है न कोई भावना |भाव, भावना ,मन,चित्त,वुद्धि ,विचार ,आकार, प्रकृति तो स्थूल रूप का परिचायक है |  
           भौतिक जीव रूप में भाव ,भावना ,मन ,चित्त ,वुद्धि ,विचार से ही सुख दुःख की अनुभूति होती है |  निर्जीव भौतिक रूप इन सभी से मुक्त हैं | केवल भौतिक जीव रूप ही दुःख –दर्द ,जन्म –मृत्यु से मुक्ति चाहता है ,निर्जीव नहीं क्योंकि उनमे भाव,भावना और सुख-दुःख की अनुभूति नहीं होती| शायद यही कारण है कि उर्जा (शक्ति ) की निर्जीव इकाई ज्यादा स्थायी है जीव इकाई अस्थायी है और जल्दी जल्दी अपने कलेवर बदलती है |आत्मा (शक्ति की इकाई )की निर्जीव अवस्था में स्थिति परिवर्तन की समस्या होती है तो यह शक्ति विकराल रूप धारण कर लेती है |पत्थर से पत्थर टकराने पर अंगार निकलता है |परमाणु का विस्फोट भी उस शक्ति का स्थिति परिवर्तन का विरोध प्रदर्शन है
      जीवात्मा (ऊर्जा की इकाई)  शरीर का जीवन यात्रा करती है और फिर शरीर छोड़कर अपने सूक्ष्म रूप धारणकर परमात्मा में विलीन हो जाती है | जीवात्मा सदा है, नित्य है ,अविनाशी है | इसीलिए जीवात्मा का न जनम होता है न मरण | जन्म मरण तो शरीर का होता है परन्तु पुनर्जन्म तो किसी का भी नहीं होता है |पुनर्जन्म के लिए वही जीवात्मा और वही शरीर चाहिए |आत्मा न जनम लेती है न मरती है और न नया रूप के लिए वही शरीर रहता है |इसीलिए पुनर्जन्म का अवधारणा का कोई अर्थ नहीं रह जाता है ,वह निरर्थक हो जाता है |क्रमश:... 

कालीपद "प्रसाद"
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सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

शब्द और ईश्वर !!!



            हर शब्द की उत्पत्ति इन्सान ने किसी विशेष अर्थ /अनुभव /एहसास इत्यादि व्यक्त करने के लिए किया है इसीलिए शब्द शक्ति सिमित है ,ईश्वर को इन शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता क्योंकि ईश्वर अनंत है, असीमित है l यही कारण है आजतक सभी धर्मशास्त्र ईश्वर का सही स्वरुप को व्यक्त करने में असमर्थ रहे है क्योंकि .कोई भी धर्म शास्त्र पूर्ण नहीं है जबकि ईश्वर पूर्ण हैंl
             मानवीय अनुभितियाँ भी अनंत हैं ,इसका आयाम भी अनंत है अत : मानव की हर अनुभूति को शब्द व्यक्त नहीं कर सकता| गुड मीठा है ,शक्कर मीठा है ,शहद मीठा है, पर हर मिठास अलग अलग है ,बहुत सूक्ष्म अंतर है , उस अंतर को निश्चित रूप से बताने वाला कोई शब्द नहीं है |उसीप्रकार कोई शब्द भी ईश्वर को ठीक ठीक परिभाषित नहीं कर पाता या यूँ कहे कोई शब्द ईश्वर तक पहुँच नहीं पाता | सब शब्द ईश्वर के आसपास घूमते हैं पर ईश्वर तक पहुँच नहीं पाते| इसीलिए इंसान भी ईश्वर को जान नहीं पाया ! जिस दिन ईश्वर तह पहुँचने वाला शब्द की उत्पत्ति होगी उसी दिन इंसान को ईश्वर मिल जायेंगे !

    Every word is  created by man to express some specific meaning/experience/feelings/perception/realization,hence power of words is limited .With these words GOD can not be described/defined/reached because GOD is eternal,boundless,infinite,measureless.
With these limited meaning of words all religious books are written, that is why these books are unable to describe/define GOD's form and HIS existence. These books are imperfect and GOD is PERFECT.
        Human perceptions are unlimited/infinite .Every perception can not be expressed by existing words, for example sugar is sweet and honey is also sweet but there is very minute difference in their sweetness.There is no word to describe that difference.Exactly the same way word-power can not exactly define or describe GOD.It revolve round GOD, can not reach GOD. God is beyond word power. The day man is able to create the word to define/reach GOD,Man will reach GODNESS.

कालीपद "प्रसाद "
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शनिवार, 8 जून 2013

जन्म ,मृत्यु और मोक्ष !







            जन्म और मृत्यु ,यही है दो अटल सत्य।जन्म होगा तो मृत्यु  निश्चित है। जन्म और मृत्यु के बीच के समय को जीवन की संज्ञा  दी गई है। इस प्रकार जन्म ,जीवन और मृत्यु ,यही है कहानी हर जीव की।परन्तु जन्म के पहले की अवस्था ,स्थिति क्या  है , मृत्यु के बाद की स्थिति क्या है ? कहाँ  जाते हैं ? यह किसी को पता नहीं है।जन्म के पहले क्या ?  मृत्यु के बाद क्या ? यही है शाश्वत प्रश्न।
              शास्त्रों  में 'आत्मा' 'की  बात कही गई  है। कहते हैं आत्मा नश्वर शरीर  को छोड़कर अलग हो जाती है और परमात्मा में विलीन हो जाती  है जिसे 'मोक्ष' कहते हैं। अतृप्त आत्मा फिर जन्म लेती है अर्थात कोई नया शरीर धारण करती है और यह सिलसिला तब तक चलता रहता है जबतक उसे 'मोक्ष' नहीं मिल जाता है।आत्मा का नया शरीर धारण करने को 'पुनर्जन्म ' कहा जाता है।अब प्रश्न उठता   है ,
 "आत्मा क्या है? शरीर क्या है ?"
शरीर में आत्मा है तो वह जीवित है। शरीर आत्माहीन है तो वह मृत है,शव है। इसका अर्थ है, आत्मा और शरीर का युग्म ही जीव है।शरीर पञ्च तत्व से बना है।शरीर के नष्ट होने पर वे तत्व पांच अलग अलग तत्वों में मिल  जाते हैं, अर्थात पूरा शरीर का रूप परिवर्तन हो जाता  है। यहाँ विज्ञान का सिद्धान्त लागू होता है कि ,"किसी पदार्थ को नष्ट नहीं किया जा सकता है केवल उसका रूप परिवर्तन किया जा सकता है। The matter cannot be destroyed but it can be transformed into another form." इसीलिए मरने के बाद शव को जलाना या कब्र में रखना, रूप परिवर्तन की प्रक्रिया है। इसके बाद के जो क्रिया कर्म ,रस्म रिवाज़ हैं उस से न आत्मा का,  न शरीर का  कोई सम्बन्ध है और न उनको कोई लाभ या हानी होती है। ये क्रियाएं शरीर और आत्मा के लिए अर्थहीन हैं और अंधविश्वास से प्रेरित हैं।
               आत्मा और शरीर का युग्म ही जीव है इसीलिए आत्मा और शरीर का घनिष्ट सम्बन्ध है। शरीर स्थूल है ,दृश्य है।आत्मा सूक्ष्म ,तीक्ष्ण ,तीब्र और अदृश्य है।शरीर पाँच तत्वों से बना है। वे तत्व हैं अग्नि ,वायु ,जल ,मृत्तिका और आकाश।ये सब मिलकर शरीर बनाते हैं और इनकी प्राप्ति माँ से होती है।माँ के गर्भ में जब शरीर बनकर तैयार हो जाता है उसमें कम्पन उत्पन्न होता है जिसे आत्मा का शरीर में प्रवेश का नाम दिया गया है अर्थात आत्मा ने एक नया शरीर धारण कर लिया है। 
                लेकिन इसे यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो यह कम्पन पैदा कैसे होता है?
               पाँच तत्वों में अग्नि उष्मा(Heat Energy)  का स्वरुप है।हीट एनर्जी परिवर्तित होकर (Electrical Energy )इलेक्ट्रिकल एनर्जी बन जाता है। यह शरीर के हर सेल (Bio Cell) को विद्युत् सेल बना देता है। यह स्वनिर्मित विद्युत् है। सब सेलों का  समुह शरीर का पॉवर हाउस बन जाता है।पुरे शरीर में विद्युत् प्रवाहित होने लगता है।हमारे शरीर में जो रिफ्लेक्स एक्शन होता है वह इसी विद्युत् प्रवाह के कारण  होता है।हमारे ब्रेन तेजी से काम करता है वह भी विद्युतप्रवाह के कारण कर पाता  है।पैर में चींटी काटता  है तो हमें दर्द महसूस होता है ,यह रिफ्लेक्स एक्शन के कारण होता है और रिफ्लेक्स एक्शन विद्युत प्रवाह के कारण होता है।जिस सेल में विद्युत् प्रवाह नहीं होता है उसमें चैतन्यता नहीं रहती (स्नायु हीन होता है ).इसीलिए उस सेल में होने वाले दर्द हमें पता नहीं लगता। यही विद्युत् जबतक शरीर में रहता है ,शरीर चैतन्य की हालत में रहता है।
              अग्नि उष्मा के रूप में वायु की गति को नियंत्रित करती है।यही वायु और विद्युत् मिलकर अपनी अपनी प्रवाह से ह्रदय ,फेफड़े तथा  अन्य महत्वपूर्ण अंगो  में कम्पन उत्पन्न करता है और यही कम्पन जीवन की निशनी है।जल और मृत्तिका शरीर को स्थूल रूप देने के साथ साथ विद्युत् और वायुके गति निर्धारण में निर्णायक भुमिका निभाते हैं। दो सेल के बीच  में कुछ स्थान खाली रहता है ,यह सेल के चलन में सहायक है।उसी प्रकार शरीर के अन्दर दो अंगो के बीच में खाली स्थान रहता है।सेल और अंगो के बीच में खालीस्थान को आकाश (शून्य ) कहते हैं।अगर खाली  स्थान नहीं होगा तो वांछित कम्पन उत्पन नहीं होगा। मन की शुन्यता भी आकाश है।इस प्रकार पञ्च तत्त्व शरीर में कम्पन उत्पन्न करने में (प्राण प्रतिष्ठा ) महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।शरीर में अग्नि का कमजोर होने पर या अत्यधिक बढ़ जाने पर वायु की गति में भी तदनुसार परिवर्तन होता है। विद्युत् संचार में भी परिवर्तन होता है।इसीलिए शरीर का तापक्रम पर नियंत्रण रखना बहुत जरुरी है।वृद्धावस्था में या बिमारी की अवस्था में शरीर में उष्मा की कमी हो जाता है। विद्युत् संचार कम हो जाता हैऔर धीरे धीरे ऐसी अवस्था में आ जाता है जब सेल आवश्यक विद्युत् उत्पन्न नहीं कर पाता  है। ऊष्मा की कमी के कारण हवा की गति रुक जाती है।यही मृत्यु की अवस्था है। शरीर में बचा  विद्युत् (Residual) निकलकर अंतरिक्ष के तरंगों में मिलजाता है। शरीर के पाँच तत्त्व अलग अलग होकर पञ्च तत्त्व में विलीन हो जाता है। इस अवस्था में किसी आत्मा की कल्पना करना या उसकी मोक्ष की कल्पना करना ,वास्तव में कल्पना ही लगता है।
           रही बात पुनर्जन्म की तो शरीर जिन अणु परमाणु से  बना था ,दूसरा शरीर वही अणु ,वही परमाणु से नहीं बनता ,इसीलिए शरीर का पुनर्जन्म संभव नहीं है। नया शरीर में पञ्च तत्व के नए अणु ,परमाणु होंगे। अत: उनमे नया कम्पन होगा।विद्युत् पॉवर हाउस भी नया होगा। यहाँ कम्पन का पुनर्जन्म या विद्युत् का पुनर्जन्म कहना सही नहीं लगता। कम्पन आत्मा नहीं ,विद्युत्  भी आत्मा 







नहीं। अत: 'आत्मा' एक वैचारिक तत्त्व है और वैचारिक  तत्त्व न नष्ट होता है, न उसका पुनर्जन्म
होता है।



नोट : विद्वान पाठकों से निवेदन है कि  वे विषय पर केवल अपनी सोच/विचार व्यक्त करे।किसी के कमेंट्स के ऊपर कमेंट्स कर वाद विवाद ना करें। इस लेख का उद्देश्य है विभिन्न विचार धारायों से खुद को और पाठकों को  परिचय कराना।  


कालीपद "प्रसाद "


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