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शनिवार, 30 अप्रैल 2016

मजदूर दिवस !


 मजदूर दिवस !

मई महीने के पहला दिन को मे डे के रूप में मनाया जाता है | इसे “अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस” या केवल “मजदूर दिवस” भी कहते हैं | १८६० से ही १० से १६ घन्टे की कार्यावधि एवं कार्य क्षेत्र की प्रतिकूल परिस्थिति के विरुद्ध ८ घन्टे प्रतिदिन कार्यावधि और कार्य क्षेत्र की बेहतर परिस्थिति की माँग उठती रही थी | परन्तु इसकी स्वीकृति यु एस में १८८६ में मिली | पहली मई १८८६ को यु एस के १३००० औद्योगिक संस्थानों से तीन लाख से भी अधिक लोग काम छोड़कर मई दिवस मनाने चले गए | सिकागो में ४०००० लोग हड़ताल पर बैठ गए | तब से मई दिवस मनाये जाने लगा | अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पहली मई (First May ) को मनाया जाता है परन्तु यु एस में सितम्बर में मनाया जाता है |
       वास्तव में यह मजदूर ही है जिसके खून पसीने के बल पर दुनिया प्रगति के पथ पर आगे बढ़ रही है | चाहे यु एस का व्हाइट हॉउस हो, या बकिंघम पैलेस हो , या फिर ताजमहल या राष्ट्रपति भवन हो ,इन सबके हर ईंट, हर पत्थर मजदूरों के पसीने से भीगा हुआ है | अगर ये इमारतें प्रगति के मापदण्ड हैं, तो इस प्रगति का प्रमुख श्रेय इन मजदूरों को जाना चाहिए | समाज को उनके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए| किन्तु अकृतज्ञ शाहजहाँ ने तो उन मजदूरों के हाथ कटवा दिये थे ताकि वे दूसरा ताजमहल न बना सके | यह स्वार्थ और अकृतज्ञता का पराकाष्ठा है | आज भी मजदूरों से ८ घन्टे से ज्यादा काम कराया जाता है परन्तु उन्हें पूरी मजदूरी नहीं दी जाती है | शहरी क्षेत्र में हालत थोडा सुधरी है परन्तु ग्रामीण क्षेत्र में मजदूरी पूरी नहीं मिलती | बिहार और झाडखंड जैसे राज्यों से ऐसी खबरें आये दिन समाचार पत्रों में पढने को मिलती है |
       देश की उन्नति में मजदूरों का योगदान अतुलनीय है | खेत खलिहानों में मजदूर, सड़क निर्माण में मजदूर, गृह निर्माण में मजदूर, औद्योगिक संस्थानों के उत्पादों में मजदूर, मजदूर का कार्यक्षेत्र असीमित है| उनकी महता भी असीमित है | सबसे बड़ी बात यह है कि देश निर्माण के हर क्षेत्र में पहला ईंट और आखरी ईंट वही रखता है, परन्तु कभी घमंड से यह नहीं कहता है कि मैं देश सेवा करता हूँ या मैं राष्ट्र भक्त हूँ | उसका समर्पित भाव ही बता देता है कि वह राष्ट्रभक्त है और राष्ट्रवादी भी | उसके विपरीत नेता और अधिकारी काम के लिए मोटी तनख्वा तो लेते ही हैं, साथ में बड़े बड़े घपले करते हैं, |अरबों रुपये लूटकर अपने तिजोरी भर लेते हैं और देशसेवा और देश भक्ति का दावा करते हैं |
      आजकल “राष्ट्रवादी” शब्द का प्रयोग बहुत ज्यादा हो रहा है | एक दो चुने हुए नारा लगा दिया और खुद को स्वयं ही राष्ट्रवादी घोषित कर दिया | जिसने वह विशेष नारा नहीं लगाया, उसे राष्ट्र विरोधी घोषित कर दिया | अपनी आवाज को बुलंद करने के लिए जुलुश निकाला और राष्ट्र की संपत्ति (बस, भवन इत्यादि ) को नुक्सान पहुंचाया| उनसे ज़रा कोई पूछे कि मजदूर जो कभी कोई नारा नहीं लगाता है, परन्तु राष्ट्र की संपत्ति निर्माण में अपना खून पसीना एक कर रहे हैं, वे सब मजदूर राष्ट्रवादी  हैं या नारा लगाकर राष्ट्रीय संपत्ति को हानि पहुँचाने वाले राष्ट्रवादी हैं ? नारा लागाने से कोई राष्ट्रभक्त नहीं बन जाता है और ना लगाने वाले देशद्रोही नहीं बन जाता है | जो सच्चे मन से देश के निर्माण कार्य में योगदान देते हैं, वही सच्चा देशभक्त है ,वही राष्ट्रवादी है | हमारे मजदूर ही सही मायने में राष्ट्रभक्त है, सच्चा राष्ट्रवादी है |
          जय मजदूर ! जय भारत !!


कालीपद ‘प्रसाद’

बुधवार, 22 जुलाई 2015

मानव अस्तित्व खतरे में !





मानवविज्ञानी एवं वैज्ञानिकों का मत है - पृथ्वी की उत्पत्ति के लाखों वर्ष बाद पृथ्वी में जीव की उत्पत्ति हुई |महुष्य की उत्पत्ति बहुत बाद करीब चालीश लाख साल बाद हुई वो भी होमो (Homo) के रूप में | परन्तु आधुनिक मनुष्य जिसे Homo Sapiens कहते हैं, उसकी उत्पत्ति करीब २००.००० वर्ष पहले हुई थी, परन्तु मनुष्य के शारीरिक,मानसिक और व्यवहारिक क्रमिक विकास ४०-५०,००० वर्ष पूर्व शुरू हुई | इतने लम्बे समय के बाद मनुष्य अपने आपको जीव में सर्वश्रेष्ट मानते है |यह सच भी है, लेकिन आज का मनुष्य का इतिहास इतना पुराना नहीं है | भारत को ही ले लिया जाय तो वैदिक काल से पहले का कोई प्रमाणित/विश्वसनीय इतिहास उपलब्ध नहीं है | इससे यही कहा जा सकता है कि भारत में आधुनिक मनुष्य का आगमन करीब ५००० साल पूर्व हुआ था |
रामायण, महाभारत में ज्ञान, विज्ञानं, आग्नेय अस्त्र, वरुण अस्त्र, वायु अस्त्र, विमान आदि का उल्लेख है |प्रश्न उठता है क्या वास्तव में वे अस्त्र और विमान मौजूद थे या यह केवल रचनाकार की काल्पना है? क्या वाणों से आग निकलती थी? पानी गिरता था? हवा चलती थी? या अतिशयोक्ति है? इसके प्रबल समर्थकों का उत्तर होगा हाँ ये सब थे पर नष्ट हो गए| अगर उनकी बात मान ली जाय तो फिर प्रश्न उठता है कि कैसे नष्ट हो गए? इससे सम्बंधित ज्ञान की पुस्तकें कहाँ गई? इसके उत्तर में  समर्थक चौराहे पर खड़े नज़र आते हैं| कौन सा जवाब दें समझ में नहीं आता है| एक तरफ श्रीकृष्ण को भगवान मानते है और मानते हैं कि धर्म की रक्षा के लिए भगवान कृष्ण ने महाभारत का युद्ध करवाया| दुसरे तरफ पूर्ण विकसित सभ्यता का विनाश का जिम्मेदार कृष्ण को मानते हैं| श्रीकृष्ण चाहते तो इस युध्द को रोक सकते थे किन्तु रोका नहीं| इसी युद्ध में मानव के साथ मानव इतिहास के सभी उपलब्धियाँ नष्ट हो गई| महाभारत के बाद नई सभ्यता की जन्म हुई| आज का मानव उसी सभ्यता का उपज है|
       कहते हैं,”इतिहास अपने आपको दोहराता है|“ आज विश्व की जो दशा है, परिस्थितियाँ जैसे बदल रही है, उससे लगता है मनुष्य की अस्तित्व ही खतरे में है| अहम्, प्रतिस्पर्धा, आणविक अस्त्रों का जाल जैसा फैलता जा रहा है, उसे देखकर यही लगता है कि संसार के सारे वुद्धिजीवी एवं वैज्ञानिक केवल आधुनिक सभ्यता नहीं, ईश्वर की सर्वोत्तम सृष्टि मानव जाति को भी पृथ्वी से निर्मूल करने में तुले हुए हैं| आज अगर मनुष्य की अस्तित्व मीट गयी तो फिर लाखों वर्ष लग जायेंगे पृथ्वी पर मानव सभ्यता विकास होने में| वैज्ञानिक अपना ज्ञान रचनात्मक कार्य में लगायें, ना कि परमाणु या जैविक अस्त्रों के निर्माण में| शक्तिशाली राष्ट्र विनम्रता दिखाएँ और अपनी शक्ति विश्व मानव कल्याणकारी काम में लगाएं| इस सभ्यता को एवं मानव जाति को सुरक्षित रखने के लिए प्रतिवद्धता दिखाए अन्यथा पृथ्वी एक दिन अपनी सृजन पर आँसू बहायगी|

कालीपद 'प्रसाद'

सोमवार, 22 जून 2015

अपूर्ण योग दिवस !

            २१ जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया |यह एक अच्छी शुरुयात है |इसके लिए आयोजक एवं इसमे भाग लेनेवाले सभी प्रतिभागी बधाई के पात्र हैं | 'योग' का अर्थ होता है 'जोड़ना" 'या "मिलाना"  अर्थात एक से अधिक वस्तुओं को एक दुसरे से संयुक्त करना ,उसमें एकरूपता लाना | ऋषि,मुनि , योगियों के लिए योग का अर्थ है- तन,मन को शांत कर आत्मा के साथ संरेखन कर परमात्मा तक पहुँचने के लिए प्रयत्न करना | अस्वस्थ शरीर में मन स्वस्थ नहीं हो सकता और अगर मन अस्वस्थ है तो ईश्वर के ध्यान में मन नहीं लगेगा | इसीलिए सबसे पहले शरीर को स्वस्थ व निरोगी बनाना अत्यन्त आवश्यक है | शरीर स्वस्थ होगा तो मन स्वस्थ होगा, तब परमात्मा के ध्यान में एकाग्रता आयगी | अत: योग का उद्येश्य है - तन,मन और आत्मा में अनुरूपता स्थापित करना |
             महर्षि पतंजलि के अनुसार योग का अर्थ "योगस्यचित्त वृत्तिनिरोध:" अर्थात योग मन के वृत्ति को रोकता है ,मन के भटकन पर नियंत्रण करता है |उन्होंने योग को आठ भागों में बांटा है जिसको अष्टांग योग कहते हैं | वे इस प्रकार हैं :- १.यम  २. नियम ३. आसन  ४. प्राणायाम  ५. प्रत्याहार  ६. धारणा ७.समाधि और ८. ध्यान |
            योग दिवस पर आयोजकों ने योग के केवल आसन और प्राणायाम पर ध्यान केन्द्रित किया है | इसके पहले यम और नियम आते हैं परन्तु इन पर ध्यान देना उचित नहीं समझा क्योंकि यम के अन्तर्गत "सत्य व अहिंसा का पालन , चोरी न करना ,आवश्यकता से अधिक चीजों का इकठ्ठा न करना " शामिल है | आज जग जाहिर है कि नेता न सत्य के मार्ग पर चलते हैं न अहिंसा का पालन करते हैं | इसके विपरीत वे दो समुदायों में हिंसा फैलाकर अपने वोटबैंक को पक्का करते हैं | मंत्री बड़े बड़े घपला कर सरकारी धन का गबन करते हैं ,दुसरे शब्दों में कहे तो चोरी करते हैं | बेनामी धंधों में माल इकठ्ठा करते हैं | ये सब योग के यम सिद्धांत के विपरीत हैं |इस दशा में यम का पालन कैसे कर सकते हैं ? अत; नेताओं ने यम पर न बोलना ही अपने हित में समझा और यम,नियम को छोड़कर सीधा आसन और प्राणायाम को योग के रूप में प्रस्तुत किया | योग के मूल सिद्धांत को छोड़कर केवल शारीरिक व्यायाम  को ही  योग का नाम दे दिया | यदि सही मायने में योग को अपनाना चाहते है तो योग के सभी आठ अंगों का पूरा पूरा पालन करना चाहिए | भ्रष्टाचार में डूबे देश के लिए यह उचित होगा कि मंत्री ,नेता ,सकारी व अ-सरकारी कर्मचारी पहले यम का पालन करने का शपथ लें और  तदनुरूप व्यावहार करे तभी योग दिवस मनाना सफल माना जायगा अन्यथा यह एक और दिखावा बनकर रह जायगा |

कालीपद "प्रसाद"

शनिवार, 10 जनवरी 2015

संत -नेता उवाच !

                   वर्त्तमान समय में  हर देश इस बात पर जोर दे रहां है कि  किस प्रकार देश की जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया जाय l जनसंख्या वृद्धि दर कम होगी तो देश की विकास  योजनायें सफल होगी | देश का विकास  होगा तो लोगो का जीवन स्तर ऊँचा उठेगा | सरकार और परिवार  के सामने कुपोषण ,अशिक्षा , बेरोजगारी ,स्वस्थ समस्याएं , गरीबी जैसे समस्याएं मुंह बाए खड़ी है ! इन समास्याओं से सफलतापूर्वक तभी लडा जा सकता है जब जनसंख्या वृद्धि दर नियंत्रित हों | आज तक भारत में यह दर  अनियंत्रित होने के कारण बच्चे कुपोषण से पीड़ित हैं , १४ आयु तक अनिवार्य शिक्षा अभियान असफल हो गया है | गरीब माँ बाप बच्चों को स्कुल भेजने के बदले काम करने भेजते हैं या फिर भीख मांगने |उनकी सामर्थ नहीं है कि आज  वे ३,४ बच्चों  को पढ़ा सके | गाँव में  यदि एक या दो बच्चे हुए तो किसी हाल में स्कुल तो भेज देते हैं पर बच्चो के पास एक या दो कपडे के अलावा कोई कपडे नहीं होते | शहर में पढ़े लिखे नौकरी पेशा लोग भी आज शिक्षा के दिन प्रतिदिन  बढ़ते खर्चे से परेशान और भवभीत है | शंकित है कि अपने बच्चों को शिक्षित कर पायेंगे या नहीं .....? माला जपने वाले संत और भष्टाचारी नेता को शायद इस भयावह स्थिति ज्ञान नहीं है ,यही कारण है कि वे हर हिन्दू औरत को ४-४ ,३-३ बचे पैदा करने की सलाह दे डाले | एक दो बच्चे ही आज माँ बाप पर भारी  पड रहा है वहाँ ४ बच्चो से परिवार की हाल क्या होगी ..? क्या कभी इन सांसद महोदय ने सोचा है ...? क्या उनके पालन पोषण ,शिक्षा ,रोग निवारण  आदि का खर्च सांसद महोदय उठाएंगे ..?या उन्हें कीड़े मकोड़े की तरह जीने के लिए छोड़ देंगे और खुद संसद द्वारा  दिया गया सब सुख सुविधा का उपभोग करेंगे ...? अगर बीस करोड़ हिन्दू औरत प्रजजन ग्रुप में हैं और प्रत्येक औरत चार बच्चे पैदा करे तो २०x४=८० करोड़ बच्चे होंगे अर्थात एक और भारत | क्या सासद ने इन सबके लिए संतुलिन भोजन ,स्वस्थ सेवा ,शिक्षा ,रोज़गार ,आवास ,कपडे ,बिजली पानी जैसे मुलभुत  आवश्यकता का प्रबंध कर रखा है  या बिना सोचे समझे अर्थहीन बयां दिया है ? इनती बड़ी जनसंख्या के किये कोई भी देश प्रभावी ब्यवस्था नहीं कर सकता | नतीजा यह होगा कि हर हिन्दू परिवार गरीब होता चला जायगा |देश गरीब होगा ,अशिक्षित जनता की संख्या बढ़ेगी ,अंध विश्वास बढेगा तो धर्म के धंधे में लगे लोगो को  ही फैयदा होगा |
                   चार -चार बच्चे पैदा करने की सलाह देने वाले हिन्दू धर्म के हिमायती संत /नेता से कोई पूछे कि उन्होंने कितने बच्चे पैदा करके हिन्दू धर्म की सेवा की............ ? ऐसे संत/नेता या तो अविवाहित हैं या बच्चे ही नहीं पैदा किये | इसीलिए  बाल बच्चों वालों को उनका सलाह ऐसा लगता है मानो एक अँधा एक आँख वाले को रास्ता दिखा रहा है | बाल बच्चेवाले अच्छी तरह जानते हैं कि एक बच्चे को इच्छानुसार शिक्षित किया जा सकता है परन्तु चार बच्चों के लिए आज संभव नहीं है |चार बच्चों को अशिक्षित या अर्ध शिक्षित ,गरीब और समाज का तिरस्कृत नागरिक बना सकते हैं !
                   हर औरत को यह सोचना होगा कि वह अपने बच्चों को स्वस्थ ,शिक्षित, समाज में उच्च स्थापित देखना चाहती है या कुपोषित ,अशिक्षित ,गरीब ,तिरस्कृत और सब आधुनिक सुविधाओं से बंचित देखना चाहती है| अपनी आर्थिक समर्थ के अनुसार ही औरत  को खुद निर्णय लेने की आज़ादी होनी चाहिए कि वह कितने बच्चे पैदा करे | किसी सांसद /संत/नेता या धर्मगुरु के मूर्खतापूर्ण निर्देश के अनुसार नहीं क्योकि  बच्चों की पालन पोषण तो उन्हें ही करना है किसी और को नहीं |


कालीपद "प्रसाद "

बुधवार, 24 दिसंबर 2014

पुरुष ,नारी ,दलित और शास्त्र







कुछ ही दिन पहले मैंने ब्लॉग में एक लेख पढ़ा l एक महिला ने नारी की दयनीय दशा का जिम्मेदार हिन्दू धर्म ग्रंथों को माना है l उन्होंने कहा कि पुरुषप्रधान समाज में पुरुषों द्वारा रचित धर्मग्रंथों के आधार पर पुरुषों के सुविधानुसार नारी को कभी पूजनीय कहा है, तो कभी बुद्धिहीन,पतित ,अपावित्र , ताड्निया कहा हैl इसका श्रीगणेश मनुस्मृति से होता है, जिसमे कहा गया है कि नारी हर परिस्थिति (बचपन से बुढ़ापा तक ) में  पुरुषों पर आश्रित हैं l वह कभी भी स्वतंत्र नहीं है l रामायण, महाभारत में नारियों के साथ किये गए व्यभिचार और उत्पीडन धर्म के आढ में किया गया हैl इन्ही धर्मग्रंथों के आधार पर भगवान् के होने का दावा किया जाता है l उनकी पूजा पाठ की विधि-विधान बताई जाती है l मनुस्मृति के आधार पर बनी समाज रचना लोगो को दकियानुशी ,स्वार्थी और निर्मम बना दिया है ! समाज को जात-पात के नाम पर टुकडो टुकडो में बाँट दिया है l किसी को ऊँची और किसी को नीची जात घोषित कर दिया है ,जिसके फलस्वरूप तथाकथित ऊँचीजात के लोग तथाकथित नीची जात के साथ उठना बैठना पसंद नहीं करते l तथाकथित नीची जात के लोगो को वेद का अध्ययन और श्रवण निषिद्ध है l यही नहीं, तथाकथित उच्चवर्ग की स्त्रियाँ भी वेदपाठ से वंचित है l  इन शास्त्रों का सहारा लेकर उच्चवर्ग के पुरुष नारियों का और निम्नवर्ग के लोगों का सामाजिक ,शारीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण और दलन किया है ,इसिलिए  आज वे दलित है l नारी भी दलित है l इन सब भेदभाव और शोषण का श्रेय मनुस्मृति को जाता है l इसीलिए उच्चवर्ग आज भी मनुस्मृति का गुणगान करना नहीं भूलते जबकि भारतीय समाज के  विघटन में मनुस्मृति का योगदान उल्लेखनीय है !
        शास्त्रों में भगवान का अर्ध-नारीश्वर की कल्पना की गई है ,अर्थात आधा शरीर नर और आधा शरीर नारी है l यह कौन व्यक्ति है ? क्या किसी ने कभी उनको देखा है ? जब ईश्वर कौन है ? पता नहीं, तो अर्धनारीश्वर का पता कैसे लगेगा ?क्या इसका मतलब यह तो नहीं है कि ईश्वर केवल एक बौद्धिक कल्पना मात्र है ?
       दुनियां में दो प्रकार के लोग होते हैंl प्रथम वे है जो मानते हैं कि ईश्वर हैं l इन्हें आस्तिक कहते हैं l दूसरे वे लोग हैं जो मानते हैं कि ईश्वर नहीं है l इन्हें नास्तिक कहते हैं l जो ईश्वर को नहीं मानते हैं उनके लिए पूजा –पाठ ,उपवास का कोई समस्या ही नहीं है l वे अपने ढंग से खाते पीते हैं और अपना जीवन यापन करते हैं l न मंदिर-मस्जिद जाने का झंझट न कोई  कर्मकांड या नमाज की बंदिश l मुसीबत तो उनको झेलनी  पड़ती है जो मानते हैं कि भगवांन हैं l वही हमारे जीवन दाता ,अन्नदाता ,जीवन के हर सुख –दुःख दाता-हर्ता  हैंl  इसीलिए धर्मग्रंथों में दिए गए नियमों के अनुसार उनकी पूजा अर्चना करनी  पड़ती है l परन्तु यह निश्चित नहीं है कि इन पूजा पाठ ,हवन ,जप से इच्छित वस्तु की  प्राप्ति होगी या फिर ईश्वर का दर्शन होगा l आप पूजा करते जाइये और 'पूंजी का स्वाह', कहकर भूल जाइये l
       ईश्वर के मानने वालों में भी दो ‘मत’  के लोग हैं l साकार और निराकार l साकार का अर्थ है कि जैसे मनुष्य या फिर कोई अन्य प्राणी का एक शरीर है वैसा ही ईश्वर का भी एक शरीर है ,चाहे वह कितना शुक्ष्म या विशाल क्यों न हो , लेकिन है l उन्होंने अपनी कल्पना से ब्रह्मा ,विष्णु ,शिव,काली, दुर्गा,लक्ष्मी, सरस्वती ,इंद्र, वरुण, अग्नि आदि छत्तीस कोटि देव देवियों की सृष्टि की है l लेकिन २०-२५ नामों को छोड़ कर बाकी देव

देवियों*  के नाम भी शायद इन भक्तों को मालुम नहीं होगा l साकार में विश्वास रखने वालों का विश्वास है कि ईश्वर किसी भी रूप में हो सकते हैं जैसे मछली .सुकर ,सांप ,पक्षी या फिर कोई नदी ,पर्वत ,यहाँ तक कि एक पत्थर भी हो सकते हैं और इन सबका पूजा विधान भी शास्त्रों में मौजूद हैं l इन विविध विश्वासों में कौन सा सही और कौन सा गलत कोई नहीं बता सकताl जनमानस भ्रमित है और हर छोटी से छोटी शंका के निवारण के लिए पंडितो के पास दौड़ना पड़ता है l वो जो कहे वही बिना  तर्क के मान लेना पड़ता हैl दूसरे शब्दों में समाज धार्मिक आस्था के लिए पूरी तरह ब्राह्मणों पर आश्रित है l
       निराकार में विश्वास रखने वालों का मत है कि ईश्वर का कोई शरीर या रंग-रूप नहीं है l वह शक्ति पुंज है, शक्ति रूप में हर जगह ,हर वस्तु में विद्यमान हैl  वह अनादि ,अदृश्य ,निविकार ,निराकार है l सूक्ष्म रूप में या यूँ कहे  शक्ति रूप में (Energy ) मौजूद हैं l
या देवी सर्व भूतेषु शक्ति रुपेण संस्थिता ........ “ में विश्वास करते हैं l जीव में चेतना ,बुद्धि ,निद्रा , भूख ,तृष्णा ,स्मृति ,भ्रान्ति ,भाव, भावनाएं सब शक्ति से संचालित है l ग्रह ,नक्षत्र तारे सब शक्ति से बंधे हुए हैं और उसी से चलायमान हैं l
       भारतीय धार्मिक संस्कृति जो धर्मग्रंथों पर आधारित है, विरोधाभाष से भरा पड़ा है l एक उदहारण यहाँ प्रस्तुत है l कहते हैं- गौतम बुद्ध खुद ईश्वर को नहीं मानते थे अर्थात वे नास्तिक थे परन्तु ई,श्वर को मानने वालों ने उन्हें भगवान का अवतार माना है l यदि गौतम बुद्ध के उपदेशों पर विचार करे तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि वे निर्गुण विचार धारा के व्यक्ति थे l इसीलिए सगुण  वालों ने उन्हें नास्तिक कह दिया l
       गौतम बुद्ध के चार मुख्य उपदेश और आठ उससे जुड़े सह उपदेश हैं l
चार मुख्य उपदेश हैं :-

१.यह संसार दुःख और कष्टों से भरा है l 

२. दुःख और कष्टों का कारण इच्छा है l

३ इच्छा का त्याग ही इस संसार के दुःख कष्टों से मुक्ति दिला सकता है l

४. मुक्ति या मोक्ष के मार्ग की प्राप्ति आठ उपमार्ग के यात्रा से ही हो सकती है l
गौतम बुद्ध ने ईश्वर प्राप्ति की बात नहीं की, न ईश्वर प्राप्ति के लिए तपस्या की l संसार में फैले दुःख –कष्टों से कैसे मुक्ति मिले इस बात को जानने के लिए तपस्या की l उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ कि मनुष्य की इच्छा ही दुःख का मूल कारण है ,इसका त्याग ही उसे  संसार के सभी दुःख-कष्टों से मुक्ति दिला सकता है l बुद्ध ने आत्मा या परमात्मा के अस्तित्व के बारे में यह नहीं कहा कि परमात्मा नहीं है l उन्होंने ईश्वर को एक व्यक्ति के रूप में न मानकर एक सर्वोच्च शक्ति के रूप में माना है जो इस विश्व के संचालन में निहित हैl इस शक्ति  का ना कोई नाम है ,ना कोई रूप या रंग है l यह ईश्वर का निर्गुण, निराकार रूप है l इसीलिए उनकी नज़रों में सब कर्म-काण्ड व्यर्थ है lआजविश्व  का विज्ञानं भी यही मानता है कि इस विश्व में शक्ति का अलग अलग रूप है l उसी के कारण गृह नक्षत्र अपने अपने मार्ग पर भ्रमण कर रहे है l इसे आप गुरुत्वाकर्षण शक्ति कहे   या कुछ और ,नाम से कोई फरक नहीं पड़ता l विश्व की उत्पत्ति के बारे में अभी खोज चल रहा है ,परन्तु यह निश्चित है कि इसके पीछे कोई व्यक्ति न होकर स्वयं-उत्पन्न कोई शक्ति है l यदि किसी दिन यह साबित हुआ,उस दिन व्यक्तिवाद और पूजा पाठ समाप्त हो जाएगा l समाज में ऊंच नीच भी समाप्त हो जायगा l
                गीता में लिखा है –जब जब धर्म की ग्लानी होगी तब भगवान अवतार लेंगे और धर्म की रक्षा करेंगे l कौन से धर्म की बात लिखी है समझ में नहीं आता l प्रतिदिन औरतों से बलात्कार हो रहा है, कमजोर वर्ग पर जुर्म किया जा रहा है, मजदूरों से काम कराकर कम मजदूरी दिया जा रहा है, मंत्री और अफसर घपला कर अपनी अपनी तिजोरी भर रहे हैं, पंडित भोले भाले लोगों  को भगवान के नाम से ठग रहे हैं, धर्मगुरु चेलिओं के साथ रंगरलिया कर रहे हैं l क्या ये सब धर्म की ग्लानी नहीं है ? क्या ये सब धर्म स्वीकृत कृत्य हैं ? अगर नहीं तो भगवान को तो अभी ही आ जाना चाहिए l लेकिन कैसे आएंगे ? भगवान कोई व्यक्ति होंगे तभी तो आयेंगे, उनका न आना इस बात को साबित करता है कि भगवान कोई व्यक्ति नहीं  हैं वरन शक्ति है जो हर भौतिक वस्तु (जीव,जंतु,वनस्पति,निर्जीव )में सूक्ष्म रूप में मौजूद हैं और कार्य करने के योग्य बनाता है l इस शक्ति के बिना कोई काम नहीं होता है l अणु .परमाणु ,बायो सेल में यह शक्ति निहित है l यह अपना रूप बदलता रहता है ,कभी ध्वनि कभी प्रकाश तो कभी बिजली बन जाती है l
       मनुस्मृति आधारित समाज की स्थापित रचना.और सोचने समझने का ढंग ,हमारे जीवन दर्शन में परिवर्तन की आवश्यकता है l वे सोच ,फिलासफी सब पुराने हैं और आज अर्थ हीनं है l आज कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छानुसार कोई भी काम कर सकता है और कर रहे हैं l निम्नवर्ग का एक व्यक्ति शिक्षक और वैज्ञानिक का काम कर रहा है और एक उच्चवर्ग का व्यक्ति जूते के दूकान में जूता बेच रहा हैl ये दोनों काम इमानदारी और सम्मानजक काम है और आज का समाज इसे स्वीकार करता है l इसीलिए मनुस्मृति का महत्त्व सिमटकर केवल मुट्ठी भर लोगो में रह गया है l अधिकतर लोगो के लिए यह निरर्थक है l जनसँख्या की दृष्टि से देखा जाय तो दलितों से ज्यादा संख्या नारीयों  का है l नारी चाहे उच्चवर्ग की हो या निम्नवर्ग की ,सबके लिए उन शास्त्रों ने उन्हें “बुद्धिहीन पतित ,अपवित्र और नरक का द्वार” कहा है l इसीलिए नारी भी दलित में सम्मिलित है l ऐसे में शास्त्र भगवान के बारे में सही सोच पैदा करने के बदले समाज में भेद भाव पैदा करने का काम ज्यादा किया है l  

कालीपद "प्रसाद"
          

मंगलवार, 26 अगस्त 2014

धर्म संसद में हंगामा

             शिर्डी के साईं  बाबा भगवान है या नहीं इस विषय पर चर्चा के लिए यह धर्म संसद शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती द्वारा बुलाया गया था !इसमें साईं भक्तों को भी अपना पक्ष रखने के लिए आमंत्रण किया गया था |सबसे पहले यह कहना उचित होगा कि यह विषय ही गलत है | साईं के भक्तों ने बार बार  यह कहा कि साईं ने कभी नहीं कहा कि वह भगवान है  |इसलिए इसपर विचार करना ही अर्थ हीन है | जब किसी के तरफ से साईं के भगवान् होने का  कोई दावा ही नहीं  है तो चर्चा किस बात की ?  जहाँ तक साईं पूजा की बात है तो हिन्दू धर्म में तो ३३ कोटि,देव देवी हैं ,भक्त किसी की  भी पूजा कर सकते है |किसी की पूजा करने में तो धर्म में कोई बाधा नहीं है ! साईं ने ऐसा काम किया है जिस से लोग उन्हें देवतुल्य मान कर पूजने लगे |इसमें गलत क्या है ? शास्त्रों में ३३ कोटि देवों के सभी नाम तो लिखे नहीं है फिर भी उनकी पूजा क्यों होती है ? जिस समय शात्रों को लिखा गया था उस समय साईं का आभिर्भाव धरती पर नहीं हुआ था इसीलिए उनका नाम शास्त्रों में कैसे आता ?शास्त्रों को लिखने वालों के स्वप्नों में नहीं आया होगा कि कलियुग में साईं नाम से कोई महात्मा होंगे जो जनता के दिलों में राज करेंगे | 

          दूसरी बात जो विचार करने लायक है वह है कि भगवान कौन हैं ?भगवान की परिभाषा क्या है ? उनका स्वरुप क्या है ? राम ,कृष्ण ,बुद्ध ,नानक भी मानव थे लेकिन उन्हें हिन्दू भगवान् मान कर पूजते हैं| क्या वे भगवान् के परिभाषा के मुताबिक खरे उतरते हैं ? किसी बड़े को या महामानव को पूज्य मान कर पूजा करना, श्रद्धा  करना तो हिन्दू धर्म का परम धर्म ,फिर साईं को पूज्यमान कर यदि उनके भक्त उनकी पूजा करे तो शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती और उनके भक्तों को आपत्ति क्यों है ?
             
          अपने को साधू सन्त कहलाने वाले  और भारतीय संस्कृति के रक्षक मानने वालों ने  आमंत्रित  साईं भक्तो से जो व्यावहार किया वह निश्चित रूप से सभ्य संकृति का परिचायक नहीं है ! वे आमंत्रित  थे ,उन्हें अपनी पूरी बात सबके सामने रखने का अवसर देना चाहिए था ,उनकी बातो का तर्क से  खंडन करना चाहिए था , वो  तो किया नहीं गया उलटे उन्हें मंच से निकाल दिया गया ! इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि शंकराचार्य के शिष्यों में अलग विचारधारा के लिए सहन शक्ति नहीं है |जो वो सोचते है उसे ही दूसरों से मनवाना चाहते हैं | हिन्दू धर्म में तो सभी धर्म समा जाते है ,सभी संप्रदाय समा जाते हैं फिर साईं सम्प्रदाय  क्यों नहीं ?

             शंकराचार्य और उनके शिष्यों से यही उम्मीद की जाती है कि इस बात को और तुल ना दे और भक्तों की भावनाओं का सम्मान करते हुए ,साईं पर कोई और विवादस्पद बयां न दें !


विनीत 
कालीपद "प्रसाद "
सर्वाधिकार सुरक्षित

शनिवार, 2 अगस्त 2014

महादेव का कोप है या कुछ और ....?

           


                                                             

               महाराष्ट्र में पुणे जिले के मालन गाँव में प्राकृतिक आपदा आई है |
इस प्रलय में ७१ लोग मारे गए ,१०० से ज्यादा लोगों  की मलवे में दबे होने की  आशंका है | ८ लोगो को बचा लिया गया है| टी वी चनेलो में ,समाचार पत्रों में यह प्रचार किया जा रहा है कि यह महादेव का प्रकोप है | वास्तविकता  तो यह है कि अत्यधिक वर्षा  के कारण मिट्टी बहुत  गिली  हो गयी  और पत्थर के  साथ मिटटी  भी नीचे आगये जिससे यह हादसा हुआ | ऐसे हर प्राकृतिक घटना को भगवान से जोड़कर जनता को डराना ठीक नहीं है| गाँव के नजदीक स्थित ज्योतिर्लिंग भीमा शंकर मंदिर में पूजा पाठ  किया जा रहा है | अभी पीड़ितों की  मदत ज्यादा जरुरी है या पूजा ? राज्य सरकार ने मृतकों के परिवार को ५-५ लाख रुपये का मुवाब्ज़ा का एलान कर चूका है , केंद्र सरकार भी २-२ लाख मुवाब्ज़ा का एलान किया है | लेकिन प्रश्न उठता है कि जिस परिवार के एक भी व्यक्ति जीवित नहीं है तो मुवाब्ज़ा किसको मिलेगा  ? कौन लेगा मुवाब्ज़ा ? क्या यह मुवाब्ज़ा सरकारी मसिनरी में दफ़न हो जायेगा या सरकारी खजाने से निकलेगा ही नहीं ? केवल घोषणा बनकर रह जायेगा?

             माना जाता है भक्त हैं तभी भगवान् का मान  है ,मर्यादा है , अस्तित्व है |अगर भक्त ही नहीं है तो भगवान को कौन पुजेगा ? उनके अस्तित्व को कौन स्वीकार करेगा ? इसीलिए भगवान् भक्तों का नुक्सान नहीं कर सकता | मंदिर के पुजारी और प्रबंधक इस बात को नज़र अंदाज़ कर देते हैं | वे भूल जाते हैं कि मंदिर में दान भक्त ही  करते है | तिरुपति का बालाजी मंदिर हो या शिर्डी का साईं मंदिर हो  ,उनके  खजाने में जो भी अरबों की संपत्ति जमा है ,सब भक्तो का ही तो दिया हुआ है | अब जब भक्त मुसीबत में है तो क्या वे रुपये भक्तो का काम नहीं आना चाहिए ? क्या मंदिरों के प्रबंधक मिलकर पीड़ित व्यक्तियों के लिए नया गाँव बसा नहीं सकता ? उनके खेतीबाड़ी ,व्यवसाय का इंतजाम नहीं कर सकता ? बच्चों के लिए दूध और बड़ों के लिए भोजन,वस्त्रादि का इंतजाम नहीं कर सकता ? इस मुसीबत के मारे लोगों के लिए यदि इन रुपये का उपयोग नहीं हुआ  तो यह अकूत धनराशी किसके और किस काम आएगा ? हवन के नाम से  घी जलाना और अभीषेक  के नाम से दूध का नदी बहाना क्या उचित है जहाँ बच्चे कुपोषण से ग्रसित हैं और दूध के लिए विलख रहे हैं? अभीषेक  के बदले यदि दूध बच्चों को पीने केलिए दिया जाय तो क्या महादेव नाराज़ हो जायेंगे ? शायद जनहितकारी यह कार्य पुजारी एवं प्रबंधकों को मंजूर नहो, कारण सर्व  विदित है |

                साईं फ़क़ीर थे और उन्होंने हर इंसानकी मदत की जो मुसीबत में पड़कर उनके पास आया |मालन गाँव के सभी निवासी साईं के भक्त है और भगवान शकर की भी, किन्तु मंदिरों के प्रबंधकों को भगवन के भक्तों की कोई चिंता नहीं | भगवान् शंकर का एक नाम आशुतोष भी है जिसका अर्थ है तुरंत,आसानी से  या थोड़े में खुश होनेवाले देव |क्या ऐसा देव भक्तों का अनिष्ट कर सकता है ? कभी नहीं ,कभी नहीं ...| क्या प्रबंधक और पूजारी साईं के परोपकार करने की  सिद्धांत से और आशुतोष के गुणों से कुछ नहीं सीखा ?


कालीपद "प्रसाद "











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शनिवार, 31 मई 2014

मोदी सरकार की प्रथामिकता क्या है ?

चित्र गूगल से साभार


          
                                                                           



                आजकल टी वी ,समाचार पत्रों में धारा ३७० छाया हुआ है | हर कोई अपना अपना मत व्यक्त कर रहा है | चचाएँ हो रही है | कोई कहा रहा है ,"संविधान के अनुसार राष्ट्रपति अध्यादेश द्वारा इस धारा को हटा सकता है |"  दूसरा कहता है ," केवल कोन्स्तितुएन्त एसेम्ली ही इसको हटा सकती है  परन्तु वह तो अस्तित्व में नहीं है ,अत:इस धारा को हटाया नहीं जा सकता है |" नव निर्वाचित नरेन्द्र मोदी सरकार के एक मंत्री इस विषय पर वयान देकर इसे विवाद का विषय बना दिया है |
           नरेन्द्र मोदी सरकार महंगाई ,विकास ,सुशासन और भ्रष्टाचार उन्मूलन को मुद्दा बनाकर सत्तारुड हुआ है | इसीलिए सरकार को सबसे पहले इन्ही मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए और उपयुक्त कदम उठाना चाहिए जिस से अनियंत्रित महंगाई का मार झेल रही जनता को महंगाई से यथा संभव मुक्ति का एहसास हो | छोटे बड़े सभी कर्मचारी भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए  हैं | बिना रिश्वत कोई काम नहीं होता ,जनता उनसे त्रस्त हैं |इसीलिए  मोदी सरकार को धारा ३७० के बजाय भ्रष्टाचार उन्मूलन ,विकास और महंगाई नियंत्रण को प्राथमिकता देना चाहिए और काम ऐसा करे कि १०० दिन में उसका असर नजर आने लगे |धारा ३७० के झगडे  में पड़कर ना जनता का, ना सरकार  का ध्यान असली मुद्दों से भटकाने की कोशिश करे |अच्छा यही होगा कि एक कानूनी सलाहकार समिति बनाकर धारा ३७० को उसके हवाले कर दिया जाय जो उसके बारीकियों और प्रासांगिकता पर विचार कर जनता के सामने रख सके कि उसके रहने से जम्मु-काश्मिर  और पुरे भारत को क्या
फ़ायदा और नुक्सान होगा  और हटाने से क्या परिणाम होगा | दोनों पहलुओं का परिणाम स्पष्ट रूप में जनता को बताया  जाय ,विशेषत: इसको हटाने पर जम्मू काश्मीर के जनता को क्या फ़ायदा होने वाला  है | यदि उनका फ़ायदा ज्यादा होता है,विकास का रास्ता खुलता है तो  यह बात को यदि सही ढंग से उन तक पहुंचाया जाता है तो झगडा शायद समाप्त हो जायेगा | आज सब विकास चाहते है | समिति का रिपोर्ट आने तक कोई मंत्री उसपर कुछ ना बोले |तबतक  सब  अपना ध्यान महंगाई ,विकास ,भ्रष्टाचार ,कालाधन की वापसी आदि कार्यों में केन्द्रित करें |अपना वायदा पूरा  करे |
           पुरानी  कांग्रेस सरकार जनता की इच्छा की कोई कदर नहीं की और संवेदन हीनता से जिस प्रकार जनलोकपाल और सिटिज़न चार्टर पर प्रतिक्रिया व्यक्त किया उससे जनता में यह सन्देश गया था कि यह सरकार भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने में लगी हुई है | इसका परिणाम सबके सामने है | धारा ३७० के वजह से यदि जनता में यह सन्देश गया  कि यह मोदी  सरकार इस धारा पर विवाद खड़ा कर जनता का ध्यान भ्रष्टाचार ,महंगाई ,विकास आदि से हटाना चाहती है तो यह मोदी सरकार के लिये अच्छा नहीं होगा | अत: प्राथमिकता के आधार पर जनता से  किया गया वायदों को पूरा करने के लिए मोदी सरकार को कारगर कदम उठाना चाहिए जिससे महगाई कम हो ,भ्रष्टाचार कम हो ,विकास तेजी से हो ,महिलाओं में सुरक्षा की भावना बढे ,युवाओं को रोजगार मिले ,किसान को फसल का उचित दाम मिले ,मजदूर को इज्जत से जीने लायक मजदूरी मिले| देश के विकास का रास्ता उद्योग ही प्रसस्त करता है परन्तु उद्योग मजदूरों पर निर्भर है ,इसीलिए मजदूरों का हित का ख्याल रखना अत्यंत आवश्यक है |
            सरकारी गोदामों में गेहू ,चावल एवं अन्य अनाज सड़ रहे हैं ,इन अनाजों की सुरक्षा और वितरण की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है| मोदी सरकार का प्रथम कदम सराहनीय है कि वह काले धन की वापसी के लिए एस आई टी गठन किया है | देखना है इसका नतीजा क्या आता है ! सरकार कमजोर लोकपाल को सुधर कर मजबूत लोकपाल लाने के लिए भी कदम उठाये  ! सी बी आई को भी सरकारी नियंत्रण से निकालकर उसे स्वायत्त संस्था (Autonomous Body ) बना देंना  चाहिये जिससे वह निष्पक्ष होकर काम कर सके |
             मोदी सरकार के सामने जनहित के अपार कार्य लंबित है | पहले उन पर ध्यान दें, न  कि धारा३७०,,मंदिर या मस्जिद | इन विवादों को वार्तालाप ,सहमति और धीरज से हल किया जाना चाहिए |


कालीपद "प्रसाद "
                   

सोमवार, 19 मई 2014

क्या मोदी दूसरा मनमोहन होगा ?



          लोकतंत्र में चुनाव के माध्यम से जनता नई सरकार बनाती है और पुरानी सरकार को गिरा देती है ! चुनाव के समय मतदाता ही मालिक होता है और मतदान के बाद मंत्री मालिक हो जाता है ,यह एक बिडम्बना है | कांग्रेस (युपिए)सरकार की सम्बेदन हीनता ,देशव्यापी भ्रष्टाचार,मंत्रियों का भ्रष्टाचार में लिप्त होना ,सरकारी धन और साधनों का दुरूपयोग ,उद्योगपतियों को लाभ पहुँचना और जनता को महंगाई के मार से मारना ,जनता ने स्वीकार नहीं किया है| यही कारण है कि जनता ने देश के सबसे पूरानी पार्टी कांग्रेस को उखाड़कर कूड़ेदान में फेंक दिया है ! विरोध में बैठने लायक भी नहीं छोड़ा और मोदी को सत्तारुड कर दिया|
‘अच्छे दिन आयेंगे ‘, ‘सुशासन’ ,’सबका साथ सबका विकास’ ‘ जैसे नारों के बल पर मोदी ने पूर्ण बहुमत तो हासिल कर लिया परन्तु उसका असली परीक्षा अभी बाकी है | जनता की आशाओं और अपेक्षाओं पर खरे उतरने के लिए मोदी को अपना स्वविवेक का उपयोग करना होगा और महत्वपूर्ण मसले पर निष्पक्ष होकर जनहित में निर्णय लेना पड़ेगा ,लेकिन इनमे कुछ बाधाएं है जैसे मनमोहन के सामने बाधाएं थीं | अधिकतर लोगों का मत है कि मनमोहनसिंह एक इमानदार और योग्य प्रधान मंत्री थे  परन्तु कमज़ोर प्रधान मंत्री थे  क्योंकि वह रिमोट चालित थे |उसके पास सारे जिम्मेदारियां थीं परन्तु शक्ति नहीं थी |शक्ति कहीं किसी और के हाथ में थी ,इसलिए वह कारगर स्वनिर्णय लेने में असमर्थ रहे | मोदी को इस परिस्थिति से बचना चाहिए| जैसा कि खबर है कि आर .एस ,एस ने घर घर अपना कार्यकर्ता को भेज कर मोदी का प्रचार किया ,यदि यह सच है तो आर .एस ,एस चाहेगा कि मोदी उनकी इच्छानुसार काम करें | आर .एस ,एस के  सिद्धांत का पालन करना अच्छा है परन्तु दिन प्रतिदिन के सरकारी काम काज उनके आदेश से हो ,यह ठीक नहीं | यह मोदी के लिए घातक सिद्ध हो सकता है |उसे दूसरा मनमोहन बनाकर रख देगा ,इसीलिए मोदी को देश हित और जनहित को ध्यान रखकर स्वतंत्र निर्णय लेना चाहिए | आर .एस ,एस -रिमोट कंट्रोल से मुक्त होना चाहिए |तभी वह अपने को एक काबिल और सशक्त प्रधान मंत्री सिद्ध कर पाएंगे |
    दूसरी समस्या उद्योग पतियों की ओर से होगी | उद्योगपतिओं ने जो धन बी जे पी के प्रचार में खर्च किये हैं वे उसे कई गुणाकर वसूलने की कोशिश करेंगे|इसके लिए मोदी पर पार्टी का दबाव भी होगा|इसमें भी मोदी को जनहित का ध्यान रख कर फैसला लेना होगा !यदि उद्योगपतियों को खुला छोड़ दिया और पट्रोल जैसे बहुप्रभावी वस्तु का दाम बढाने की आजादी दी गई तो सभी वस्तुओं का दाम बढ़ जायेंगे और महंगाई की मार झेल रही जनता को और ज्यादा मार झेलनी पड़ेगी | इस से जनता में रोष फ़ैल जायेगा |अत: मोदी सरकार को महंगाई को नियंत्रण में रखने के कारगर कदम उठाना पड़ेगा |
     मोदी पर कई बार लोगो ने आरोप लगाया है कि वह एर्रोगंट (arrogant)है |  इसका क्या कारण है ,यह तो नहीं पता ,परन्तु यदि उसमे ऐसा कुछ है तो उसे छोड़ना पड़ेगा और उनके आदर्श पुरुष अटल बिहारी बाजपेयी जैसे धैर्यवान ,विवेकशील पुरुष बनकर राजधर्म का पालन  करना पड़ेगा ,तभी वह एक स्वतंत्र ,सशक्त,सर्वमान्य  प्रधान मंत्री बन पायेगा|

कालीपद "प्रसाद "
18 /०५/२०१४