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गुरुवार, 24 जुलाई 2014

अच्छे दिन आयेंगे !



च्छे दिन आयेंगे, मैंने कहा था
जनता के लिए नहीं ,मैंने अपने लिए कहा था |
कमल का फुल खिलेगा ,मैंने कहा था
जनता के लिए नहीं ,मैंने पार्टी के लिए कहा था |

महंगाई कम होगी ,मैंने कहा था
जनता के लिए नहीं ,मैंने नेताओं लिए कहा था |
परिवर्तन लाभ का सौदा होगा ,मैंने कहा था
जनता के लिए नहीं ,मैंने साहूकारों लिए कहा था |
रामराज्य लौट आएगा ,मैंने कहा था
जनता के लिए नहीं ,भ्रष्टाचारियों लिए कहा था |
हर बात का गलत अर्थ निकाला ,जो मैंने कहा था
जनता समझी अपने लिए,उनके लिए कुछ नहीं कहा था |

कालीपद "प्रसाद "
सर्वाधिकार सुरक्षित

शनिवार, 19 जनवरी 2013

शहीद की मज़ार से

चित्र गूगल से साभार 

हेमराज,सुधाकर की मज़ार से ,आ रही पुकार रे
नव जवान !  नव जवान  !!  नव जवान !!!   जाग रे!!!!

देख ले, एल ओ सी पर खड़े हैं धोखेबाज शत्रु अनेक 
सिखा दे पढ़ा उनको ,  धोखेबाज  को उचित सबक
बिन बुलाये अतिथि ये तेरे घर आये हैं,       
स्वागत करना धर्म तेरा ,पुरानों की रीति  है,
स्वागत सज्जा कर ले तू ,रायफल ,मशीनगन ,तोप से
पुकार रही सदैव तुझे ,मेन्धर -लद्दाख की घाटी रे
नव जवान !  नव जवान  !!  नव जवान !!!   जाग रे!!!!

जागो और जागकर बचाओ  अपनी माँ की लाज को
समय आया है वही , तुम्हे इन्तेजार था  जिसका
उठो अर्जुन एकबार फिर गांडीव को संभल लो
अहँकारी दू:शासन फिर ललकारा ,भीम गदा उठा लो
ऐ नकुल ! समझो तुम अब शकुनि की चाल को
कर ना पाए बध  अब कोई, वीर अभिमन्यु को 
ये पुकार है माताओं की औरपुकार है बहनों की रे
नव जवान !  नव जवान  !!  नव जवान !!!   जाग रे!!!!

देश -देश में सिखाओ , देश भक्ति का पाठ तुम
सिखाओ बल एकता  का ,ऐ साहसी निडर तुम!
 दिखा दे अपनी शौर्य दुनियां की रणस्थल में
 समझा दे ,दूर कर दे भ्रान्ति ,शत्रुओं के दिलों से
 हम नहीं कायर ,वीर चूड़ामणि है, शिष्य द्रोणाचार्य के
प्रेम करते हैं, स्नेह करते हैं सबसे ,ये हमारे धर्म की पुकार रे   
नव जवान !  नव जवान  !!  नव जवान !!!   जाग रे!!!!

शहीदों की औलाद हो तुम ,उनकी वीरता का प्रतीक हो तुम
हँसते हँसते खेले जिन्होंने आग से , फल मिला है आज़ाद हो तुम 
अब अगर रक्षा न कर पाए उसकी ,न कर पाए देश कल्याण तुम
तो धिक्-धिक् तुम्हे ,क्यों  झूठे नौ जवान कहलाते हो तुम ?
ये पुकार है देश की, और पुकार है उस माँ की रे
जिनकी किरीट हिमालय है,चरण धो रही है महासागर की लहरें
नव जवान !  नव जवान  !!  नव जवान !!!   जाग रे!!!!



रचना : कालीपद "प्रसाद "
©सर्वाधिकार सुरक्षित





बुधवार, 19 सितंबर 2012

भाव और शब्द

कोमल,मुलायम भाव के धनी,
                           चुनकर शब्द सागर से मोती दो चार ,
भाव-धागों में पिरीते क्रम से, और
                           बनकर तैयार होता है मोती-हार।

उन्माद लहरें डराते सबको,
                             खड़े हैं जो सागर तट में ,
साहसी , सूरबीर, लहर चीरकर,
                             चुन लाते हैं मोती, सागर तल से।

मैंने देखा कुछ बिखरे मोती,
                             पड़े हैं मेरे मन के भाव सागर में ,
किस धागे में पिराऊं उनको,
                             पड़ गया मैं इसी सोच में।

कभी भाव मिले तो शब्द नहीं,
                             कभी शब्द मिले तो भाव नहीं ,
शब्द - भाव में कुछ मेल हो सकता है ,
                              पर पूर्ण मिलाप  आसान  नहीं।

माना कि शब्द में शक्ति अनत है ,
                              पर भाव के आगे वह लाचार है,
हर नया भाव ,विचार के लिये ,
                               करना पड़ता है नया शब्द का संचार है।

ह्रदय वीणा में उठती कम्पन करती है ,
                               उद्वेलित और चंचल मन प्राण ,
 बलवती ,वेगवान  भावना बहने लगती है कलम से ,
                                छोड़ जाती है कागज पर छाप, शब्द रूप में।

भाव जब चरम सीमा में हो ,
                            नहीं करती इंतजार कागज कलम का ,
आह !!!!!! वाह  !!!!!! के रूप में गूंज उठती है ,
                            आवाज बनके धड़कन दिल का।

आवाज भी शब्द का अन्य रूप है ,
                             गूंजती है सदा , सर्वत्र सूक्ष्मरूप में,
भाव भी सूक्ष्म है,  रहती है  मन के  आँगन में ,
                           भाव ,शब्द  एक हो जाता है मिलकर ब्रह्मनाद में।


कालीपद "प्रसाद "
सर्वाधिकार सुरक्षित