तस्वीरें क्या बोल रही है ?
निस्तब्द निशा ,दिशाएं भी खामोश थी
पिया परदेश में,तन मन में उदासी थी
मेरा रोना देख , रजनी और चाँद भी रोया
अश्रु इतना गिरा ,सिन्धु में ज्वार आ गया |
धान की लम्बी लम्बी बालियाँ झुककर
नम्रता से मानव को यह बतलाती है
तुमने धरती को एक दाना दिया था
धरती ने हजार दाना लौटाया है |
हरा है पौधा ,पीला है सरसों का फूल
फल इसका क्षुद्र, ज्यों एक कण धुल
हरी साडी पहनाती वो धरती को
और बेणी में लगाती है पीला फुल |
ना छंद का ज्ञान ,ना गीत ,ना ग़ज़ल लिखता हूँ
दिल के आकाश में बिखरे बादलों को शब्द देता हूँ
इसे जो सुन सके वो संवेदनशील प्रबुद्ध ज्ञानी हैं
विनम्र हो ,झुककर उन्हें मैं नमन करता हूँ |
कालीपद 'प्रसाद "
सर्वाधिकार सुरक्षित








