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मंगलवार, 14 जनवरी 2014

बोलती तस्वीरें !



                                                     तस्वीरें क्या बोल  रही है ?








निस्तब्द निशा ,दिशाएं भी खामोश थी 
पिया परदेश में,तन मन में उदासी थी
मेरा रोना देख , रजनी और चाँद भी रोया
अश्रु इतना गिरा ,सिन्धु में ज्वार आ गया | 





धान की लम्बी लम्बी बालियाँ झुककर
नम्रता से मानव को यह  बतलाती है 
तुमने धरती को एक दाना दिया था
धरती ने हजार दाना लौटाया है |









हरा है पौधा ,पीला है सरसों का फूल 
फल इसका क्षुद्र, ज्यों एक कण धुल
हरी साडी पहनाती वो धरती  को 
और बेणी में लगाती  है पीला फुल |





ना छंद का ज्ञान ,ना  गीत ,ना ग़ज़ल लिखता हूँ
दिल के आकाश में बिखरे बादलों को शब्द देता हूँ 
इसे जो सुन सके वो संवेदनशील प्रबुद्ध ज्ञानी  हैं
विनम्र हो  ,झुककर  उन्हें  मैं  नमन  करता  हूँ |



कालीपद 'प्रसाद "
सर्वाधिकार सुरक्षित



शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

विचित्र प्रकृति



चार मुक्तक (प्रकृति पर )




 हिम शिखर है या सफ़ेद ओड्नी पहनी है धरती
हरा लहंगा पर रंग विरंगे फुल सजाई धरती
सरिता के स्रोत  से कुछ रेखाएं भी खींची है
काले काले बादल से काजल लगाईं धरती |



घन घोर काली घटाएं रवि का रास्ता रोक लिया
धरती के आँगन को काली चादर से ढक दिया
किन्तु रवि -रश्मि नहीं मानती कोई बाधा
बादल के सीना चीरकर रवि का उदय हुआ |








नहीं जन ,नहीं जल कण की निशान कहीं 
जहाँ तक नजर जाय ,बालुकण  के ढेर वहीँ 
किन्तु करिश्मा धरती की  देखो गौर से 
सुखा महा मरुभूमि में शाद्वल सूखता नहीं |


शाद्वल=जलाशय=oasis





आधारहीन नभ में देखो असंख्य तारे लटके हैं 
क्रम से सब अपने पथ में आवागमन करते हैं 
नहीं करते अतिक्रम कोई किसी और के रास्ते में 
तभी तो जिन्दा है ,अनादि काल से भ्रमण करते हैं |



कालीपद "प्रसाद "
                                                      ©सर्वाधिकार सुरक्षित