रविवार, 15 सितंबर 2013

कानून और दंड

               फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट ने नववें महीने में जघन्य बलात्कारियों को मौत की सज़ा सुना दी।  न्यायालय की इस निर्णय से जहाँ  जनता में  न्यायालय के प्रति विश्वास और मजबूत  हुआ है वहीँ महिलाओं में भी आत्म विश्वास बढ़ा है।  अधिकतर लोग इस निर्णय का स्वागत किया है परन्तु समाचार पत्र न्यूज चैनेलों के ख़बरों के अनुसार अपने अर्थ हीन  तर्क देकर  कुछ लोग इसे विवादस्पत बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उनका तर्क है ,"मृत्युदंड भयोत्पादक न होकर एक बदला है जो न्याय के नाम पर लिया जाता है.।  वे लोग यह नहीं बताते कि  यदि  मृत्युदंड समस्या का हल नही है,   तो इस प्रकार के जघन्य अपराध का समाधान क्या है ?शायद उनको भी पता नहीं  हैं। खुद ही भ्रमित है और समाज को भी भ्रमित करना चाहते हैं। 
                     इन लोगों का सबसे बड़ा तर्क यह होता है कि "मृत्युदंड के बाद भी महिलाओं के प्रति अत्याचार या बलात्कार रुका  नहीं और न रुकेगा । इसीलिए मृत्युदंड नहीं देना चाहिए। "
                    उनसे मेरा प्रश्न है ," क्या दुनिया में किसी देश में कोई ऐसा कानून है जो बलात्कार या कोई विशेष अपराध को जड़ से ख़त्म कर दिया या पूरी तरह रोक दिया ?" उनका उत्तर निश्चित रूप से नकारात्मक होगा।
मेरा दूसरा प्रश्न ," यदि नहीं, तो फिर कानून किसलिए बनाए जाते  है ?"
निश्चित  रूप से कानून का  पहला उद्येश्य दंड देना नहीं है वरन लोगो को जागृत करना है कि उन्हें समाज में नियमों के अनुसार किस प्रकार व्यावहार करना चाहिए और यदि वे नियम तोड़े गए तो क्या दंड मिल सकता है। अत; कानून के द्वारा उस अपराध प्रवृत्ति को कम करने की कोशिश की जाती है.। अपराधी में दंड का भय पैदा किया जाता है ताकि वह अपराध करने के पहले कई  बार सोचे। जो व्यक्ति सबकुछ जानबूझ कर कानून का उल्लंघन करता है ,उसे तो दंड मिलना ही चाहिए। इसलिए उनका यह तर्क कि ,"मृत्युदंड से महिलाओं के प्रति हिंसा रुकेगा नहीं।" सही  है क्योकि यह किसी तरीके से रुक नहीं सकती , केवल कानून का भय दिखाकर (दंड देकर ) इसको कम किया जा सकता है। आतंक वादी विरोधी कानून है ,उनको मृत्युदंड भी दिया जाता है फिर भी आतंकवाद पनप रहा है , क्यों ?   इसीलिए मृत्युदंड देना जरुरी है.। इसके बाद भी अगर कम नहीं हुआ तो उसका कारण कनुन के अमल (implementation )में छुपा हुआ है.। उदहारण ;जैसे -यदि एक बलात्कारी पर १० साल से मुकदमा चलता है ,फिर सजा होने पर उसका कार्यन्वयन करने में और पांच साल लगता है तो इस से अपराधियों के मनोबल बढ़ता है और कानून का भय समाप्त हो जाता है.। इसलिए कानून को लागू करने वाले और न्याय करने वाले संस्थायों में सुधार  की जरुरत है.। हर मुकदमा ( case)समयबद्ध और त्वरित होना चाहिए। इस से अपराध करने वालों में भय पैदा होगा। 
                समाचार के अनुसार, National Crime Record Bureau के नवीनतम आकड़ों के अनुसार केवल २०११ में  ११७ लोगो को मृत्युदंड दिया गया है लेकिन किसी को भी अभी तक फाँसी  नहीं दिया गया है.। इस से अपराधियों के मनोबल बढ़ता है और पीड़ित  व्यक्ति और उनके परिवार की पीड़ा और बढ़ती  है। 
                  न्यायालय का हाथ बँधा  हुआ है.। न्यायाधीश को अपने मन ,विवेक को एक तरफ रख कर ,जो कानून कहता  है ,उसी के मुताविक फैसला सुनाना पड़ता है.। यही कारण है कि एक ही अपराध करने वाले पांच व्यक्तियों में से  चार को मृत्युदंड मिलता है और एक को तीन साल की कैद। जुवेनाइल कोर्ट के न्यायाधीश के विवेक को जुवेनाइल कानुनसे घोर संघर्ष करना पडा होगा परन्तु विजय कानून की हुई.। यह कैसा कानून ? कैसा न्याय ?
कौन हैं जिम्मेदार इस तुगलकी कानून का ? निश्चित रूप से कानून के बनाने वाले ही इसका जवाब दे सकते हैं। इसलिए कानून के बनाने वालों  से यह्प्रश्न करना चाहता हूँ कि " १७साल ९  महीने और १८ साल के लड़के में काम क्षमता ,नजरिया, शारीरिक क्षमता ,मानसिक क्षमता ,समझदारी ,भावना इत्यादि (Sex,attitude.physical efficiency , mental efficiency ,understanding,,emotion etc....).में क्या अन्तर है  जिसके आधार पर १८ साल वाले को मृत्युदंड और १७ साल ९ महीने वाले को ३ साल की सज़ा देकर सुधर गृह भेज दिया जाता है? ऐसे क्रूरतम अपराध के लिए न्यायाधीश को  यह अधिकार होना चाहिए कि अपराध के समानुपात में वह दंड दे सके.। 

                मनोवैज्ञानिकों का मत है कि अलग अलग बच्चों का  मानसिक ,शारीरिक ,भावनात्मक विकास अलग अलग समय पर  होता है.। जिस बच्चे में काम वासना उच्चस्तर पर हो,शारीरिक रूप से सम्भोग के काबिल हो ,मानसिक रूप से परिपक्क हो ,जिसमे यह समझ हो कि बलात्कार के सबूतों को मिटा देने पर वह कानून के फंदे से बच जायगा ,ऐसे बालक (मर्द) को  केवल उम्र के आधार पर नाबालिग मान लेना  क्या तर्क संगत   है ? वह तो सभी दृष्टि कोण से एक बालिग़ (बयस्क  ) व्यक्ति है। अत: उसके द्वारा किया गया बलात्कार जुवेनाइल कानून के अंतर्गत नहीं बयस्क कानून के अंतर्गत आना चाहिए और उसे वही दंड मिलना  चाहिए जो बाकी सबको मिला है.। 

              न्यायालय की नज़र में आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता है और न कोई उम्र। आंतंकवादी केवल आतंकवादी होता है.। फिर बलात्कारी के मामले में यह उम्र का बंधन क्यों ? बलात्कारी तो बलात्कारी है.। यदि उम्र को मानना ही है तो उसका सजा योग्य उम्र उस दिन से मान्य  होना चाहिए जिस दिन से वह सम्भोग करने के योग्य हो जाता है.।
               न्यायालय कानून को अनुशरण करता है इसीलिए कानून में परिवर्तन होना अति आवश्यक है। कानून का अमल (implementation )सही ढंग से और जल्दी हो ,न्यायालय समयबद्ध तरीके से  निर्णय सुना दें ,दण्ड की तामिल जल्दी हो ,तभी अपराधियों में भय उत्पन्न होगा और अपराध में कमी आएगी।

कालिपद "प्रसाद "

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

Teachers' Honour Award

Teachers' Honour Award
शिक्षक गौरव पुरस्कार

मित्रों ,
           आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि  मेरी बेटी शर्मिला ,शिक्षा :एम.  ए.(हिन्दी ), एम. ए.(इतिहास ) बी एड, वरिष्ट हिन्दी शिक्षक  के रूप में पुणे  स्थित एक प्रख्यात विद्यालय में कार्य रत है। उसके उत्कृष्ट शिक्षण ,कार्यनिष्ठा ,शिष्ट व्यावहार ,शिक्षक एवम विद्यार्थियों में  लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए ,पुणे महानगरपालिका ने  "शिक्षक दिवस" के अवसर शर्मिला को "शिक्षक गौरव पुरस्कार "  से सम्मानित किया है। आशा है यह उसके जीवन में प्रेरणा स्रोत बनेगा। 

आपका 
कालीपद "प्रसाद "



मेरी बेटी  शर्मीला  मण्डल


                                              मेमेंटो और प्रशस्ति पत्र



बुधवार, 4 सितंबर 2013

सब्सिडी बनाम टैक्स कन्सेसन !



                 सरकार की अघोषित नीति  है कि यदि सरकार एक रूपया जनता के हित में खर्च करती है तो उसका बढ़  चढ़ कर प्रोपेगंडा किया जाय। समाचार पत्र, टी वी न्यूज चैनेल ,रेडियो सब में विज्ञापन  देकर सबको बताया जाय ,चाहे उसमे दस रुपये और खर्च क्यों न हो जाय। इसके विपरीत व्यापार और उद्योग को अरबों रूपया का टैक्स कंसेसन के रूप में फ़ायदा पहुँचाते हैं उसका किसी को कानो कान खबर नहीं होने देते परन्तु उसे दबा देते हैं। वास्तव में सरकार औद्योगित घराने का सेवक है। जनता की याद  तब आती है जब वोट लेना होता है।
                   वित्तमन्त्री हमेशा राजकोषीय घाटा का रोना रोते रहते हैं। इसका दोष यह कहकर जनता पर डाल  देते हैं कि पेट्रोल/डीज़ल /रसोई गैस /खाद्य सामग्री पर  दिया गया सब्सिडी के वजह राजकोषीय घाटा बढ़ता ही जाता है। वित्तमंत्री कभी यह नहीं बताते कि वाणिज्य और उद्योग को दिया गया सब्सिडी के बजह राजकोषीय घाटा बढ़ा है क्योकि उन्हें (efficiency incentive) क्षमता-प्रोत्साहन के नाम से दिया जाता है। सब्सिडी शब्द उनके लिए डिग्निटी से नीचे का शब्द है.लेकिन है वही  ,लिफाफे में बंद कर लेते हैं । इसे चाहे आप सब्सिडी कहे ,टैक्स कन्सेसन कहे या क्षमता-प्रोत्साहन ,हर रूप में यह राजकोषीय घाटा बढाता है।  
                  बर्ष २००५-२००६ से सरकार  टैक्स कंसेसन दे रही है। खबरों के मुताबिक अबतक उद्योग को ३०लाख करोड़ रुपये से ज्यादा टैक्स कन्सेसन दे चुके हैं। केवल चालू वजट में ही वित्तमंत्री ने ५.७ लाख करोड़ का टैक्स कन्सेसन का गिफ्ट उद्योग को दिया है। अगर पिछले तीन साल की बात करें तो  यह अंक करीब १५ लाख करोड़ का है। यदि केवल तीन साल का टैक्स कंसेसन १५ लाख करोड़ रुपये वसूल कर सार्वजनिक  Infrastructure क्षेत्र में लगाया जाता तो  राजकोषीय घाटा समाप्त हो जाता, साथ साथ बहुत लोगो को रोजगार भी मिलती। इस से यही पता लगता है कि  राजकोषीय घाटा के कारण उद्योग को दिया गया टैक्स कांसेसन है, जनता को दिया गया सब्सिडी नहीं। 
                     हाल ही में संसद ने खाद्य सुरक्षा बिल पास किया। अनुमान है कि  इसमें सरकार को ३५ से ४० हजार करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी। लोग  पूछ रहे है … ये पैसे आयेंगे कहाँ से ? अगर उद्योग को दिया गया  टैक्स कांसेसन पर नज़र डाले ,जो अबतक ३० लाख करोड़ रुपये है,। इस तुलना में ४० हजार करोड़ बहुत छोटा अंक है , केवल. ०. ०१३४% ऑफ़ ३० लाख करोड़। इस छोटा अमाउंट  को उद्योग से निकालने में वित्तमंत्री को ज्यादा समय नहीं  लगेगा ,यह तो उनका बाँया हाथ का खेल है.। केवल इन्तेजार रहेगा सोनिया गांघी जी के इशारे की.।  सोनिया जी ने मन मोहन से अच्छी तरह गुना भाग करवा कर ही यह बिल आगे बढाया है.।  इस बिल को लाने का उनका कोई भी उद्येश्य रहा हो ,…. २०१४ के इलेक्शन जितने की उद्येश्य से हो या  वास्तव में भारत के जनता की भूखमिटाने की इच्छा से हो , अभी वह बधाई के पात्र नहीं बनी.। अभी तक केवल वह दो ही सीढ़ी  ही चढ़ पायी है.। पहला बिल का ड्राफ्ट बनवाना ,दूसरा संसद से पास करवाना और राष्ट्रपति से मंजूर करवा कर कानूनी रूप  देना। तीसरी सीढ़ी पार करना बहुत कठिन है.। वह है वितरण प्रणाली में मौजूद लीकेज को बंद करना और चौथी सीढी  है यह सुनिश्चित करना कि यदि एक व्यक्ति के लिए १० रुपये मंजूर  हुआ है   तो उसको १० रूपया ही मिले। उस से कम नहीं। वितरण प्रणाली में यदि लीकेज  बंद नहीं किया गया तो यह भी ९०,००० करोड़ के मनरेगा योजना जैसे असफल योजना होगी। तब यह समझा जायेगा कि सोनिया  गाँधी और कांग्रेस पार्टी गरीबों के नाम लेकर लीकेज के माध्यम से अपने चट्टे  बट्टों को लाभ पहुँचाया है.। यही तो होता आया है.। सोनिया गाँधी वास्तव में वधाई के हकदार तभी होगी जब वितरण प्रणाली में मौजूदा लीकेज बंद करवा कर  वास्तविक गरीब को उसका हक़ दिलवा देगी ।  


कालीपद "प्रसाद "

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

देश किधर जा रहा है ?

स्वाधीनता के बाद राष्ट्र के निर्माताओं ने भारत के संविधान में यह विकल्प खुला रखा था कि आवश्यकतानुसार देश हित में और अच्छे  साफ़ सुथरा प्रशासन केलिए यदि जरुरत पड़े तो संविधान के धारायों में परिवर्तन किया जा सके या नई धारा जोड़ा जा सके.। परन्तु इस विकल्प का उपयोग अब  दोषी ,अपराधियों को बचाने में किया जा रहा है . जन लोकपाल बिल जो दोषियों  के दण्ड देने के लिए बनना था उसे लटका दिया गया और दोषियों को बचाने का बिल एक दिन में पास हो गया.।न्यायालय के आदेश को निरस्त करने के लिए इसका उपयोग किया जा रहा है.। चुनाव आयोग,आर टी आई   जैसे संवैधानिक संस्थाओं को पंगु बनाने में किया जारहा है.। क्या यह संविधान द्वारा दिया गया अधिकार का दुरूपयोग नहीं है ? भ्रष्टाचार समाप्त कैसे होगा  जब भ्रष्टाचारियो को सुरक्षा मिलेगा ? सरकार का नियंत्रण न मूल्य वृद्धि पर है न रुपये की मूल्य पर है।  देश सुधरेगा तो कैसे ? देश किधर जा रहा है ?




कालिपद "प्रसाद "

सोमवार, 12 अगस्त 2013

नेता उवाच !!!

 
!!!शहीदों को सलाम !!!



हमारे देश के नेतायों के बारे में जनता यह सोचती है कि वे लोभी हैं , स्वार्थी हैं,   स्वार्थ के लिए कुछ भी कर सकते है.। लेकिन देश की रक्षा करते .हुए शहीद हुए वीरों के लिए भी उनके मन में निंदनीय विचार हो सकते हैं ,यह जानकर हर भारतवासी का मन ग्लानी से भर जाता है ,क्षोभ होता है ।  नेताजी कहते है :-


                                                                            नेता उवाच !!!



"सैनिक और पुलिस रक्षक हैं ,सरहद और नेता के 
जनता तो"कैटल "है , हाँका चाहिए हाँकने के लिए.। 

सरहद पर शहीद हुए तो क्या हुआ ?
शैनिक होते हैं शहीद होने के लिए.। 

जिन्दा  थे, पर कष्ट में थे ,कष्ट में थे परिवार भी 
दशलाख और पेन्सन मिला ,परिवार को और क्या चाहिए?"

नेतायों के सोच पर इंसानियत शर्मशार हुआ 
गीदड़ ज्यों शव को नोचता ,शहीद की कुर्बानी बे-आबरू हुआ.। 

सुना है ,चोर डाकुयों ने अपना भेष बदल लिए 
सर पर टोपी ,बदन पर खादी-कुर्ता पहन लिए.। 

शहीदों को हार्दिक श्रद्धांजली !!!
  
हाँका - जानवरों को हांक कर इकट्ठे करने वाला व्यक्ति

कालीपद "प्रसाद "
सर्वाधिकार सुरक्षित


मंगलवार, 6 अगस्त 2013

भ्रष्टाचार और अपराध पोषित भारत!!

               इस आलेख का आधार श्री  पूरण खंडेलवाल जी  द्वारा उठए गए महत्वपूर्ण प्रश्न "भ्रष्टाचार और अपराध पोषित व्यवस्था  को बदलने  का रास्ता आखिर क्या है ?" इसके टिप्पणी संक्षेप में तो दे दिया था परन्तु बात दिमाग में गूंजती रही और अंतत: इसका उत्तर  विस्तृत रूप में यह खुद ही एक आलेख बन गया  है.।
              वास्तव में इस प्रश्न से जुड़े कोई भी व्यक्ति इस प्रश्न का उत्तर  नहीं देना चाहता है ,राजनेता तो  कतई  नहीं। इस प्रश्न के उत्तर के लिए हमें   लोकतंत्र के प्रमुख आधारों पर विचार करना पड़ेगा।भारतीय संविधान के अनुसार लोकतंत्र के तीन आधार स्तंभ हैं।  वे है संसद (Legislative), कार्यकारिणी/प्रबंधकारिणी (Executive ), और  न्यायलय (Judiciary )। लेकिन आधुनिक समय में एक और जुड़ गया है ,वह है मिडिया। इस प्रकार लोकतंत्र में चार आधार स्तंभ हो गए है।  इन  चार आधार स्तंभ के अलावा जनता को सबसे शक्तिशाली आधार स्तंभ माना गया है.। यह जब चाहे शासन में उलट फेर कर सकती है। सैद्धांतिक रूप से यह सुनने में बहुत अच्छा लगता है परन्तु वास्तविकता से यह कोशों दूर है.। वास्तविकता यह है की भारत में जनतंत्र के नाम पर करीब ५५० परिवारों का राज चल रहा है और बाकी जनता उनका बंधक हैं। भ्रष्टाचार और अपराध को मिटाने के लिए जनता के पास कुछ मौलिक अधिकार होना चाहिए जो उनके पास नहीं है.। वे अधिकार हैं १. यदि उनके चुने हुए प्रतिनिधि  जनता के हित में काम ना करे तो उसे पद से हटाने की क्षमता (right to recall ) होनी चाहिए ,वह अभी नहीं है.।  २. यदि उम्मीदवार का क्रिमीनल रिकॉर्ड है तो उसे रिजेक्ट (right to reject )करने का आप्शन मतपत्र में होने चाहिए ,यह भी अभी नहीं है.। अत: वर्तमान परिस्थिति में जनता व्होट के माध्यम से कोई परिवर्तन नहीं ला सकता। सभी पार्टी के उम्मीदवार  दागी है ,उन्ही में से किसी को वाध्य होकर चुनना पड़ेगा। जनता के पास कोई विकल्प नहीं है.।  जनता लाचार है.।   
           संविधान के निर्मातायों ने दुनियाँ के संविधानों से अच्छी अच्छी बातों को लेकर भारत के संविधान को उदार और आदर्श संविधान बनाने की कोशिश की। उन्होंने सातिर बदमास और संगीन अपराधियों पर नकेल कसने की कोई कोशिश नहीं की.। असल में उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि  कोई अपराधी भी सांसद   बन सकते हैं.।  उदारता  से उन्होंने संविधान में यह प्रावधान रखा है कि २/३ बहुमत से संविधान के किसी भी धारा को बदला या नई धारा जोड़ी जा सकती है.। इसी का फायदा उठाकर , लोकतंत्र के रक्षक न्यायालय ,चुनाव आयोग एवं अन्य संस्थायों द्वारा दिया गया जनहित निर्णयों को संसद में नियम बनाकार निरस्त  किया जाता है और अपराधियों को बचाया जाता है.।  हाल ही में आर टी आई द्वारा फैसला सुनाया है  कि सभी पार्टिया आर टी आई के दायरे में आएगी । इसको निरस्त करने के लिए केबिनेट ने 'पार्टी को आर टी आई से बाहर' रखने का प्रस्ताव पास कर दिया।चूँकि यह सभी पार्टी के हित में है ,इसमें कोई बहस नहीं होगी और सर्वसम्मति से एक दिन में ही पास हो हाने की उम्मीद है.।  सुप्रीम  कोर्ट ने फैसला दिया है कि जिसको दो साल या उससे ज्यादा की सजा हुई है वह चुनाव नहीं लड़ सकता और कोई जेल से चुनाव नहीं लड़ सकता। पार्टियाँ इस फैसले से भी  खुश  नहीं हैं और इसको भी विधेयक द्वारा निरस्त करने की तैयारी चल रही है.। यह संविधान द्वारा दिया गया विशेषाधिकार का दुरूपयोग है जो ना तो जनता के हित में है ना देश के हित में है.। यह अधिकार सिर्फ जनता और देश हित में उपयोग  होना चाहिए था पर यह गुंडे-बदमास ,आर्थिक अपराधियों और बाहुबलियों  को बचाने में किया जा रहा है.।
             जनता "भ्रष्टाचार और आपराधिक " परिस्थिति में परिवर्तन दो ही तरीके से ला सकती है.। पहला वैलेट द्वारा (व्होट द्वारा ),दूसरा है क्रांति द्वारा।व्होट के द्वारा परिवर्तन संभव नहीं हैं ,इसका कारण उपरोक्त  पंक्तियों  में मैंने बताया है.। दूसरा है क्रान्ति। इसमें  भी जल्दी कोई परिवर्तन लाना संभव नहीं दीखता। क्रान्ति के लिए एक ऐसा नेता चाहिए जो सभी दृष्टिकोण से साफ़ सुथरा छबि रखता हो ,साथ में गांधीजी जैसे जनता का हिताकांक्षी हो,जिनके आह्वान पर जनता मर  मिटने के लिए तैयार  हो जाय.। आज भारत  जाति ,धर्म, साम्प्रदायिकता , भाषा आदि में बंटा हुआ है.।  इस  दशा में कोई सर्वमान्य नेता का होना भी मुश्किल लगता है.। इसीलिए क्रान्ति तो दूर दूर तक दिखाई नहीं देती। हाँ नेता विहीन जन-क्रान्ति अगर हो जाय तो यह एक नया इतिहास होगा। फिलहाल जनता मार खाने के मुड  में हैं और नेतायों द्वारा हर तरफ से पिटे जा रहे हैं।
            मिडिया सामाजिक पिलर है.। आज यह पिलर सबसे शक्तिशाली पिलर के रूप में उभरी है.।  जनता की सफलता उसके  कार्य प्रणाली पर निर्भर है.। भ्रष्टाचार के  विरुद्ध श्री अन्ना हजारे के  आन्दोलन को जब मिडिया का  सहयोग मिला, बहुत सफल हुआ परन्तु जब मिडिया ने सपोर्ट  करना बंद कर दिया वह आनोलन अब मृतप्राय है.। इसका कारण यही है की मिडिया भी ईमानदार नहीं है.। अपने स्वार्थ के लिए कभी भी पल्ला बदल लेते हैं.। यही कारण है कि  सचाई की जीत नहीं होती। मिडिया छोटी छोटी बातों को सनसनीखेज बना देती है और कभी कभी बड़ी बड़ी सचाई को दबा देती है.। भ्रष्टाचारी राजनीतिज्ञों और अपराधियों के करतूतों को पहले तो उछालते  हैं फिर अचानक न जाने उनके सुर  क्यों बदल जाते हैं.। या तो वे चुप बैठ जाते हैं या उनके ही कसीदे पड़ने लग जाते हैं.। निष्पक्षता नहीं के बराबर है ,जबकि समाचार प्रसारण में अपनी मत नहीं, वास्तविकता का प्रसारण होना चाहिए। ज्यादातर चेनलों के मालिक व्यावसायी या राजनेता हैं ,इसीलिए ये निष्पक्ष नहीं हो सकते।अपने पैर पर कुल्हाड़ी कैसे मारेंगे ? जनता के हित के पहले उन्हें तो अपना हित देखना है ,इसीलिए जनता  को इनसे भी ज्यादा आशा नहीं रखनी चाहिए।
            अब हम संवैधानिक पिलर की बात करें। उनमें सबसे पहले है   संसद (Legislative)। जनता चुनकर अपना प्रतिनिधि संसद भेजती है इस उम्मीद से कि  वे जनता के हित के लिए ही काम करेंगे, परन्तु पिछले साठ  वर्ष का अनुभव बताता है कि चुनाव जीतने के बाद इनको अपनी फायदा के सिवाय कुछ याद् नहीं रहता है.।पूंजीवादी व्यवस्था में जनता को उतना ही साधन उपलब्ध कराया जाता है  जितना उसको जीवित रहने केलिए आवश्यक है.। हमारे चुने हुए प्रतिनिधि भी यही कर रहे हैं.। खुद सभी सुख सुविधायों का उपभोग कर रहे हैं और जनता को जीवित रखने के लिए दो टुकड़े उनके सामने डाल देते हैं.। प्रजातंत्र के आड़ में पूंजीवाद को चला रहे हैं.। वे केवल अपनी फायदा की बात सोचते हैं.। अभी यदि वे लखपति हैं ,तो करोडपति कैसे बने? करोडपति हैं तो अरबपत कैसे बने ? यही होता है उनका प्रमुख एजेंडा। पूरी सरकारी योजना इस बात को ध्यान में रखकर बनयी जाती है कि  उस से उनको कितना लाभ होने वाला है.। अपने और अपने गुर्गों के फायदा के लिए कोई भी नियम को तोड़ मरोड़ सकते हैं और बिना कोई दंड के इस अपराध से मुक्ति पा लेते हैं.। मौजूदा क़ानून उनके ऊपर नकेल कसने में असमर्थ हैं या असमर्थ बना दिया गया है.। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को प्रभावहीन कर दागी और सजायाप्त नेतायोंको चुनाव लड़ने का अधिकार को पुनर्जीवित  करने के लिए  सभी पार्टियाँ एक मत हो जाएँगे परन्तु जनहित के लिए "जन लोकपाल बिल " या 'महिला आरक्षण बिल' पर कभी एक मत नहीं होंगे। इसीलिए मौजूदा परिस्थिति में चुने हुए प्रतिनिधियों से कुछ अच्छाई या जनता के पक्ष में गुणात्मक सुधर की उम्मीद करना , अपने आपको छलना होगा।
             दूसरा संवैधानिक पिलर है कार्यकारिणी/प्रबंधकारिणी (Executive )। यह संसद की छाया है या यों कहे सांसद और मंत्रियों की छाया है.। जो भी नियम संसद में पारित होता है ,उसका पालन करना /कराना कार्यकारिणी/प्रबंधकारिणी की जिम्मेदारी है.। यह अधिकार मुख्यत: आई ए एस और आई पी  एस अधिकारियों के हाथ में हैं.। इंसान स्वाभाव से लालची होते हैं और यह सच साधू महात्माओं पर भी लागू होता है.।  आई ए एस और आई पी  एस तो  हम आप जैसे साधारण लोग होते हैं.। इनमे भी वे दुर्गुण हैं परंतु  सुप्त अवस्था में रहते है लेकिन संगत से आदत बिगड़ जाती है.। दिनरात वे भ्रष्ट नेतायों के साथ घूमते रहते हैं.। नेता उन्ही से गलत काम करवाते हैं ,क़ानून तुड़वाकर देश की सम्पद लुट रहे हैं,बदले में उन्हें भी कुछ टुकड़े  डाल  देते हैं.। पकडे गए तो बलि का बकरा यही अधिकारी को बनाया जाता है , नेता नहीं ।  इसीलिए इनमे  यह सोच भी आ जाता है कि बलि   का बकरा जब बनना है तो खाकर ही बनो।  यहीं से अधिकारी भी भ्रष्ट हो जाते  हैं.। लेकिन सभी आई ए एस और आई पी  एस अधिकारी इस विचार धारा के पोषक नहीं है.। इसका ज्वलंत उदहारण है दुर्गा शक्ति नागपाल।यह भली भांति जानते हुए कि उत्तर प्रदेश की भ्रष्ट सरकार के मंत्री और अधिकारीयों से पंगा लेना भारी पड़ेगा ,   उसने अपनी इमानदारी पर आंच आने नहीं दी.। कल तक दुर्गा शक्ति नागपाल को कोई नहीं जानता था परन्तु आज उसकी इमानदारी , उसकी सच्ची पहचान बनकर पूरा भारत में फ़ैल गया है.। उसकी इमानदारी और हिम्मत ने भ्रष्टाचारी सरकार की पोल खोल दी.। समाचार के अनुसार आई ए एस असोसिएसन "दुर्गा शक्ति " के सपोर्ट  में चट्टान की तरह खड़ी है.। अगर यह सच है तो उत्तर प्रदेश सरकार उसका बाल भी बांका नहीं कर सकती। आई ए एस अधिकारी चाहें तो एक दिन में ही अखिलेश सरकार को झुका  सकती है.। यही मौका है उन्हें नियानुसार सरकार को नोटिस  देकर असहयोग आन्दोलन करना चाहिए। जनता को असुविधा  जरुर होगी परन्तु लम्बी अवधी में यह जनता के लिये  फायदामंद साबित होगा , इसीलिए यदि आई ए एस अधिकारी असहयोग आन्दोलन करते हैं तो जनता को उनसे सहयोग करना चाहिए। जनता और कार्यकारिणी/प्रबंधकारिणी मिलकर भ्रष्ट नेताओं को आइना दिखा सकते हैं.। कार्यकारिणी/प्रबंधकारिणी को चाहिए कि वह नेताओं के अनैतिक ,गैर कानूनी आदेश का पालन ना करे। हमेशा कानून के दायरे में काम करे और जनता के हित में काम करे.। सरकार तो असल में वही चलाते हैं ,इसीलिए जनता का अभी भी उन भर पूरा भरोसा है.। वे चाहें तो भारत को भ्रषाचार मुक्त बनाने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं.। 
             संवैधानिक तीसरा और अंतिम पिलर है न्यायलय (Judiciary )। जब लोग संसद और कार्यकारिणी से निराश हो जाते हैं तो न्यायलय (Judiciary ) के शरण में आते हैं.। लोगो को अभी भी न्यायालय  पर भरोषा है। बिगत दिनों में दिया गया सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय कि, "जिसको दो  साल  या उससे ज्यादा दंड मिला हो वह चुनाव नहीं लड़ सकता और कोई व्यक्ति जेल से चुनाव नहीं लड़ सकता। " जनता का विश्वास को और दृढ़ बनाता है.। परन्तु न्यायाधीश निर्मल यादव के बारे में सुनकर शंका उत्पन्न होती है.। हालाकि सभी न्यायाधीश ऐसे नहीं होते है.। भ्रष्टाचारी न्यायाधीशों की संख्या नगण्य हैं.। इसीलिए जनता न्यायालय के प्रति पूर्ण आस्था रखती है.।  भविष्य में अगर किसी से सबसे ज्यादा उम्मीद है तो वह है न्यायालय, जो जनता की आज़ादी और हित की सही  रक्षक हैं.। उपरोक्त दोनों निर्णय जैसे जनहित निर्णय यदि न्यायालय सुनाते रहे तो संसद कितने निर्णयों को प्रभाव हीन बना पायेंगे ? अगर ऐसा करेंगे तो फिर जनक्रान्ति तो निश्चित है.।  इसीलिए मेरा विचार है कि न्यालालय , कार्यकारिणी और जनता  मिलकर ही भारत की 'भ्रष्टाचार और अपराध पोषित" छबि को बदल सकते हैं.।

नोट : ऊपर बताये गए सभी विचार मेरे व्यक्तिगत विचार हैं ,आप सहमत हो सकते है और नहीं भी। टिप्पणी  में अपना विचार व्यक्त कर सकते हैं.। 


कालीपद  "प्रसाद"


बुधवार, 24 जुलाई 2013

वर्षा ऋतु



वर्षा के बुँदे
रिम झिम बरसे
सावन भादों।

मेघ में छुपे
सूरज गगन में
अँधेरी धरा।

काले बादल
बूंद बूंद बरसे
बादल रोया।

हरित घास
हरीभरी धरती
हरा है खेत।

नया कोंपल
हरा  हरा  पातल
हरा पादप।

सी -सी झिंगुर
टर-टर मेंढक
गीत मधुर ।

खुश नहीं भू
दुराचारी नर से
खपा प्रकृति।


कहीं तूफान
कही पर अकाल
इंद्र की मर्जी।


धुप गायब
पवन का प्रकोप
जीवन ठप्प।


टुटा छप्पर
बारिश निरंतर
भीगे सामान।

१०
११
भीषण बाढ़
सड़क बनी नदी
घर में पानी।

१२
बेहाल नर
अभूत बरबादी
पुकारे त्राहि।
१३
और ना बर्षो
रुक जाओ बादल
दुखी ना करो। 
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कालीपद "प्रसाद "
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शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

क्या अर्पण करूँ !






 Religion aims at " getting salvation " and salvation  is always personal or individual, therefore religion  is strictly personal. It cannot be a matter of any community. One has to decide how to get salvation and what is the meaning of salvation. If salvation means " merging with God" or ' reaching God' then a soul can merge with God  individually.   'Getting salvation following a religion' means following   a path (Hinduism, Islamism, Buddhism,Jainism .etc.) through which one can walk up to  God. Every individual has the right to choose a path of his own choice. 
         When God is Omnipresent and Omnipotent why should one go to Mandir, Masjid, Grudwara, Church etc . in search of God ?. He is present everywhere.
          In mandir when you pray, you close your eyes and view HIM in your perception. You can do the same from the place where you are. Meditation is possible when there is peace around.Meditation is not possible in a noisy place. In ancient time, for meditation, Muni Rishis used to go to forest /lonely places  where there is no noise . How can one meditate in noisy atmosphere of mandir ,masjid ?
           Every religion gives stress over "Devotion" i .e 'Offering of sentiments-feelings-Bhavna'. One can get salvation if he is emotionally  devoted to God . There is no need of offering of any material things to God. Because  everything is created by him , so all belongs to him. Many religions don't allow any material offerings . But in some religion, it is allowed to safe guard the interest of so called priest. If you think deeply, you will realize that no one need to offer any material things in the name of God. Everything belongs to Him. We can only BOW before Him and Offer 'shradhaa -sentiments-feelings-Bhavna' and  patra - pushpam which convey our feeling to HIM.
             Since religion is personal , it should not be made public. All prabachans on TV channels are not making the people really religious/spiritual but making the innocent people orthodox. Through pranbachan  they are extracting money from the God fearing people .It is neither good for the individual nor the society .



           मज़हब का उद्येश्य यदि 'जन्म- मृत्यु' के बंधन से मुक्ति पाना है -अर्थात "मोक्ष " है, तो यह निश्चित रूप से बिलकुल निजी और व्यक्तिगत है। "मोक्ष" तो एक व्यक्ति को उसके कर्म के आधार (ईश्वर के प्रति  भाव,भक्ति और समर्पण )से मिल सकता है। अत: मज़हबी (धार्मिक,आध्यात्मिक )कार्य केवल और केवल व्यक्तिगत कार्य है। यह  किसी भी हालत में सामाजिक या सामुदायिक नहीं हो सकता। मोक्ष का अर्थ यदि "आत्मा का परमात्मा से विलय " है  तो एक आत्मा का परमात्मा से विलय भी व्यक्तिगत है।अत: मज़हब व्यक्तिगत है।
           "मोक्ष" के लिए कौन सा 'मत' या 'पथ ' का सहारा लेना है यह भी व्यक्तिगत विश्वास या आस्था पर निर्भर है। हर व्यक्ति को अपने अपने पथ (मत- जिसे मज़हब कहते हैं जैसे हिन्दू , इस्लाम ,सिख ,इशाई ,जैन,बौद्ध  इत्यादि मत ) चुनने का हक़ है। कोई भी मत बुरा नहीं है। परन्तु एक मत पर चलने वाले कुछलोग अपने निहित स्वार्थ सिद्धि के उद्येश्य से अपने मत को श्रेष्ट बताकर दुसरे की बुराई  करते हैं। यही काम दुसरे मतवाले भी करते हैं।फलस्वरूप सभी' मत' में कुछ बुराइयाँ आ गई हैं और अच्छाईयाँ  दब गयी है।
             जब ईश्वर सर्वशक्तिमान ,सर्वव्यापी हैं ,हर जगह ,हर व्यक्ति ,हर  कण में व्याप्त हैं तो उन्हें खोजने के लिए मंदिर , मस्जिद, चर्च ,गुरूद्वारे  जाने की क्या आवश्यकता है ? वहाँ जाकर भी तो वह मिलते  नहीं। वहाँ  जाकर आप आँखें बंद कर उनका ध्यान करते हैं।अपने कल्पना (Perception)  में उनकी दर्शन करते हैं। उनसे बाते करते हैं। यह काम तो आप अपने घर में किसी शांत स्थान पर बैठकर कर सकते हैं। ईश्वर का ध्यान करना ,मनन करना यदि पूजा है तो यह काम जहाँ शांति है वहीँ हो सकता है ना कि वहाँ, जहाँ सैकड़ों लोग बाते कर रहे हों या लाउड़ स्पीकर से कोई पाठ हो रहा हो।वहाँ वास्तविक पूजा तो नहीं  होती  परन्तु पूजा का आडम्बर का प्रदर्शन जरुर होता है। इसीलिए प्राचीन काल में ध्यान के लिए मुनि -ऋषि शोर शराबे से दूर जंगल/पर्वत /निर्जन स्थान में जाते  थे।
           आजकल पूजा माने मौज मस्ती। आयोजक आपका जेब ढीला करके (चंदे के रूप में )  खूब मौज करते हैं।पूजास्थल से शांति को मार मार कर भगा दिया जाता है और गलाफाडू  रैप या डिस्को बजाया  जाता है।

          प्रत्येक मज़हब (मत) "भाव,भावना ,भक्ति ,समर्पण "पर जोर देता है अर्थात ईश्वर को केवल आपकी "भक्ति " चाहिए और कुछ नहीं। "भक्ति" जो केवल आपकी निजी है ,व्यक्तिगत है।बाकी सब तो ईश्वर का है। यह तन ,मन भी उनका है। जो भी भौतिक चीजे हैं (रुपये -पैसे,धन,संपत्ति )सब उनका दिया  हुआ है। इन सबकी उन्हें कोई चाह  नहीं। उन्हें केवल आपकी श्रद्धा-भक्ति चाहिए।

            किसी किसी मज़हब  में भौतिक सामग्री का अर्पण वर्जित है। परन्तु किसी २ में पुजारियों के हित के लिए यह अर्पण स्वीकार किया जाता है।यदि आप गंभीरता से सोचे तो आपको महसूस होगा की ईश्वर को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है। सभी तो उनका है। हमें केवल उनके सामने सर झुककर अपनी "श्रद्धा-भक्ति -भाव" अर्पण करना है। उनके द्वारा बनाए पत्ते और फुल, हमारी भावना  का सौरभ को  उन तक पँहुचाने  में सक्षम हैं। 
               सार्वजानिक रूप से टी वी चेनलों में लम्बी लम्बी प्रवचन लोगो को आध्यात्मिक नहीं बना रहे हैं वरन सीधे साधे  धर्मभीरु लोगो को अन्धविश्वासी बनाकर उनसे पैसा वसूल कर रहे हैं।

कालिपद "प्रसाद "   


बुधवार, 3 जुलाई 2013

मेरी माँ ने कहा !

मेरी माँ ने कहा !

 पढाई समाप्त कर नौकरी के लिए
 घर छोड़ जब शहर के लिए था  निकलना ....
मेरी माँ ने मुझ से कहा बेटा!
एक बात मेरी तुम गाँठ बांध रखना। 
दुनियां में अच्छे लोग है कम  ,
शैतान  हैं  ज्यादा ,
अच्छों के साथ करना दोस्ती ,
शैतानों से तुम हमेशा बचके रहना।
शैतानों को पहचानना मुश्किल है
ये अच्छों का मुखौटा पहनकर घूमते हैं
जरुरत से ज्यादा मीठी मीठी बाते करते हैं ,
बातों बातों में ही मन मोह लेते हैं।
धीरे धीरे नज़दीक  आते है
मित्रता की झूठी ढ़ोंग रचाते हैं
अपनी नकली भेद बताकर तुम्हे
तुमसे  तुम्हारा असली भेद ले जाते हैं।
पहले भेद लेते हैं फिर पीछे से वार करते हैं
दोस्ती का कोई मूल्य नहीं उनके पास
जान लेने में भी नहीं हिचकते हैं।
दोष गुण  जैसा भी हो तुम्हारा
खरी खरी  बोले जो मुहं पर तुम्हारा
चाहे तुम्हे अच्छा लगे या बुरा
दोस्ती तुम उन्ही से ही करना।
दोष को छुपाकर जो झूठे तारीफ़ करे तुम्हारा
मीठी मीठी बाते कर जो मन बहलाए तुम्हारा
उनलोगों से तुम हमेशा कुछ दूर रहना
उनसे कभी दोस्ती का हाथ ना बढ़ाना।
शैतान लोगों का पहचान जानो ,यही
सावधान रहना ,इनके चंगुल में कभी फंसना नहीं।


कालीपद "प्रसाद "


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शनिवार, 8 जून 2013

जन्म ,मृत्यु और मोक्ष !







            जन्म और मृत्यु ,यही है दो अटल सत्य।जन्म होगा तो मृत्यु  निश्चित है। जन्म और मृत्यु के बीच के समय को जीवन की संज्ञा  दी गई है। इस प्रकार जन्म ,जीवन और मृत्यु ,यही है कहानी हर जीव की।परन्तु जन्म के पहले की अवस्था ,स्थिति क्या  है , मृत्यु के बाद की स्थिति क्या है ? कहाँ  जाते हैं ? यह किसी को पता नहीं है।जन्म के पहले क्या ?  मृत्यु के बाद क्या ? यही है शाश्वत प्रश्न।
              शास्त्रों  में 'आत्मा' 'की  बात कही गई  है। कहते हैं आत्मा नश्वर शरीर  को छोड़कर अलग हो जाती है और परमात्मा में विलीन हो जाती  है जिसे 'मोक्ष' कहते हैं। अतृप्त आत्मा फिर जन्म लेती है अर्थात कोई नया शरीर धारण करती है और यह सिलसिला तब तक चलता रहता है जबतक उसे 'मोक्ष' नहीं मिल जाता है।आत्मा का नया शरीर धारण करने को 'पुनर्जन्म ' कहा जाता है।अब प्रश्न उठता   है ,
 "आत्मा क्या है? शरीर क्या है ?"
शरीर में आत्मा है तो वह जीवित है। शरीर आत्माहीन है तो वह मृत है,शव है। इसका अर्थ है, आत्मा और शरीर का युग्म ही जीव है।शरीर पञ्च तत्व से बना है।शरीर के नष्ट होने पर वे तत्व पांच अलग अलग तत्वों में मिल  जाते हैं, अर्थात पूरा शरीर का रूप परिवर्तन हो जाता  है। यहाँ विज्ञान का सिद्धान्त लागू होता है कि ,"किसी पदार्थ को नष्ट नहीं किया जा सकता है केवल उसका रूप परिवर्तन किया जा सकता है। The matter cannot be destroyed but it can be transformed into another form." इसीलिए मरने के बाद शव को जलाना या कब्र में रखना, रूप परिवर्तन की प्रक्रिया है। इसके बाद के जो क्रिया कर्म ,रस्म रिवाज़ हैं उस से न आत्मा का,  न शरीर का  कोई सम्बन्ध है और न उनको कोई लाभ या हानी होती है। ये क्रियाएं शरीर और आत्मा के लिए अर्थहीन हैं और अंधविश्वास से प्रेरित हैं।
               आत्मा और शरीर का युग्म ही जीव है इसीलिए आत्मा और शरीर का घनिष्ट सम्बन्ध है। शरीर स्थूल है ,दृश्य है।आत्मा सूक्ष्म ,तीक्ष्ण ,तीब्र और अदृश्य है।शरीर पाँच तत्वों से बना है। वे तत्व हैं अग्नि ,वायु ,जल ,मृत्तिका और आकाश।ये सब मिलकर शरीर बनाते हैं और इनकी प्राप्ति माँ से होती है।माँ के गर्भ में जब शरीर बनकर तैयार हो जाता है उसमें कम्पन उत्पन्न होता है जिसे आत्मा का शरीर में प्रवेश का नाम दिया गया है अर्थात आत्मा ने एक नया शरीर धारण कर लिया है। 
                लेकिन इसे यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो यह कम्पन पैदा कैसे होता है?
               पाँच तत्वों में अग्नि उष्मा(Heat Energy)  का स्वरुप है।हीट एनर्जी परिवर्तित होकर (Electrical Energy )इलेक्ट्रिकल एनर्जी बन जाता है। यह शरीर के हर सेल (Bio Cell) को विद्युत् सेल बना देता है। यह स्वनिर्मित विद्युत् है। सब सेलों का  समुह शरीर का पॉवर हाउस बन जाता है।पुरे शरीर में विद्युत् प्रवाहित होने लगता है।हमारे शरीर में जो रिफ्लेक्स एक्शन होता है वह इसी विद्युत् प्रवाह के कारण  होता है।हमारे ब्रेन तेजी से काम करता है वह भी विद्युतप्रवाह के कारण कर पाता  है।पैर में चींटी काटता  है तो हमें दर्द महसूस होता है ,यह रिफ्लेक्स एक्शन के कारण होता है और रिफ्लेक्स एक्शन विद्युत प्रवाह के कारण होता है।जिस सेल में विद्युत् प्रवाह नहीं होता है उसमें चैतन्यता नहीं रहती (स्नायु हीन होता है ).इसीलिए उस सेल में होने वाले दर्द हमें पता नहीं लगता। यही विद्युत् जबतक शरीर में रहता है ,शरीर चैतन्य की हालत में रहता है।
              अग्नि उष्मा के रूप में वायु की गति को नियंत्रित करती है।यही वायु और विद्युत् मिलकर अपनी अपनी प्रवाह से ह्रदय ,फेफड़े तथा  अन्य महत्वपूर्ण अंगो  में कम्पन उत्पन्न करता है और यही कम्पन जीवन की निशनी है।जल और मृत्तिका शरीर को स्थूल रूप देने के साथ साथ विद्युत् और वायुके गति निर्धारण में निर्णायक भुमिका निभाते हैं। दो सेल के बीच  में कुछ स्थान खाली रहता है ,यह सेल के चलन में सहायक है।उसी प्रकार शरीर के अन्दर दो अंगो के बीच में खाली स्थान रहता है।सेल और अंगो के बीच में खालीस्थान को आकाश (शून्य ) कहते हैं।अगर खाली  स्थान नहीं होगा तो वांछित कम्पन उत्पन नहीं होगा। मन की शुन्यता भी आकाश है।इस प्रकार पञ्च तत्त्व शरीर में कम्पन उत्पन्न करने में (प्राण प्रतिष्ठा ) महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।शरीर में अग्नि का कमजोर होने पर या अत्यधिक बढ़ जाने पर वायु की गति में भी तदनुसार परिवर्तन होता है। विद्युत् संचार में भी परिवर्तन होता है।इसीलिए शरीर का तापक्रम पर नियंत्रण रखना बहुत जरुरी है।वृद्धावस्था में या बिमारी की अवस्था में शरीर में उष्मा की कमी हो जाता है। विद्युत् संचार कम हो जाता हैऔर धीरे धीरे ऐसी अवस्था में आ जाता है जब सेल आवश्यक विद्युत् उत्पन्न नहीं कर पाता  है। ऊष्मा की कमी के कारण हवा की गति रुक जाती है।यही मृत्यु की अवस्था है। शरीर में बचा  विद्युत् (Residual) निकलकर अंतरिक्ष के तरंगों में मिलजाता है। शरीर के पाँच तत्त्व अलग अलग होकर पञ्च तत्त्व में विलीन हो जाता है। इस अवस्था में किसी आत्मा की कल्पना करना या उसकी मोक्ष की कल्पना करना ,वास्तव में कल्पना ही लगता है।
           रही बात पुनर्जन्म की तो शरीर जिन अणु परमाणु से  बना था ,दूसरा शरीर वही अणु ,वही परमाणु से नहीं बनता ,इसीलिए शरीर का पुनर्जन्म संभव नहीं है। नया शरीर में पञ्च तत्व के नए अणु ,परमाणु होंगे। अत: उनमे नया कम्पन होगा।विद्युत् पॉवर हाउस भी नया होगा। यहाँ कम्पन का पुनर्जन्म या विद्युत् का पुनर्जन्म कहना सही नहीं लगता। कम्पन आत्मा नहीं ,विद्युत्  भी आत्मा 







नहीं। अत: 'आत्मा' एक वैचारिक तत्त्व है और वैचारिक  तत्त्व न नष्ट होता है, न उसका पुनर्जन्म
होता है।



नोट : विद्वान पाठकों से निवेदन है कि  वे विषय पर केवल अपनी सोच/विचार व्यक्त करे।किसी के कमेंट्स के ऊपर कमेंट्स कर वाद विवाद ना करें। इस लेख का उद्देश्य है विभिन्न विचार धारायों से खुद को और पाठकों को  परिचय कराना।  


कालीपद "प्रसाद "


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